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अंतरिक्ष में सफलताओं की कहानियाँ लिखेगा यह साल

इक्कीसवीं सदी में भारत की सफलता-यात्रा की सबसे बड़ी सफलताओं में अंतरिक्ष-कार्यक्रम को भी रखा जाएगा। इस दृष्टि से 2025 का वर्ष देश के अंतरिक्ष-अनुसंधान में सफलताओं की कुछ नई कहानियाँ लिखेगा। 2024 के अंत के साथ शुरू हुई, इस कहानी के कई अध्याय इस साल लिखे जाएँगे। नए साल के पहले छह महीनों में छह बड़े मिशन लॉन्च होने जा रहे हैं। इनमें चार जीएसएलवी, तीन पीएसएलवी और एक एसएसएलवी रॉकेटों का प्रक्षेपण शामिल है। इस साल इसरो ने 36 सैटेलाइटों का प्रक्षेपण करने की तैयारी की है। इनमें सबसे ज्यादा ध्यान खींचेगा अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन में भारतीय अंतरिक्ष यात्री का जाना।

ये मिशन न केवल भारत की वैज्ञानिक क्षमताओं को प्रदर्शित करेंगे, बल्कि अंतरिक्ष विज्ञान में भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा को और मजबूत करेंगे। अब भारत अंतरिक्ष में कई बड़े और महत्वाकांक्षी मिशनों को देखेगा। इनमें चंद्रयान-4, गगनयान, लूपेक्स, और शुक्रयान जैसे प्रमुख प्रोजेक्ट शामिल हैं।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने 30 दिसंबर को स्पेडैक्स मिशन की सफल लॉन्चिंग के साथ भारत की अंतरिक्ष यात्रा को नई ऊँचाई दी है। इसके तहत जो दो उपग्रह अंतरिक्ष में भेजे गए हैं, उनकी डॉकिंग 16 जनवरी को हुई। डॉकिंग के बाद, इसरो ने बताया कि दोनों उपग्रहों का एक ही ऑब्जेक्ट के रूप में नियंत्रण सफल रहा। अंतरिक्ष एजेंसी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट के ज़रिए बताया, अनडॉकिंग और पावर ट्रांसफर चेक आने वाले दिनों में किए जाएँगे।

यह मिशन हालांकि भविष्य के तमाम अभियानों के लिए महत्वपूर्ण है, पर खासतौर से चंद्रयान-4 के लिए इसकी सफलता जरूरी है। केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री डॉ जितेंद्र सिंह ने बताया कि  भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) स्पेडैक्स मिशन ऐतिहासिक है,  क्योंकि इससे अंतरिक्ष में दो उपग्रहों की डॉकिंग करना या उन्हें जोड़ने अथवा अनडॉकिंग की उपलब्धि हासिल हुई है। यह काम भारत से पहले अमेरिका, रूस और चीन ही कर पाए हैं। इस मिशन की सफलता भारत की भविष्य की अंतरिक्ष महत्वाकांक्षाओं के लिए अति आवश्यक है। डॉकिंग तकनीक अब आगे समानव ‘गगनयान’ मिशन, चंद्रयान-4 और भविष्य के भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन जैसे दीर्घकालिक मिशनों के लिए आवश्यक होगी।

अंतरिक्ष के लगभग शून्य में इसरो ने 28,800 किलोमीटर प्रति घंटा की गति से परिक्रमा कर रहे दो उपग्रहों को संयुक्त करने का कार्य किया है। यह एक चुनौतीपूर्ण कार्य था, क्योंकि इस दौरान दोनों उपग्रहों को सावधानीपूर्वक संचालित करने की जरूरत थी, ताकि उनके सापेक्ष वेग को मात्र 0.036 किलोमीटर प्रति घंटा तक कम किया जा सके। इसके लिए ‘चेज़र’ और ‘टारगेट’ नामक दो उपग्रह अंतरिक्ष में भेजे गए, जिन्हें जोड़कर एक इकाई बनाई गई।

स्पेडैक्स मिशन आने वाले वर्षों में अधिक जटिल अंतरिक्ष मिशनों का मार्ग प्रशस्त करेगा। इस मिशन में पीएसएलवी-सी60 का उपयोग किया गया।

इलेक्ट्रिक प्रोपल्शन

इस वर्ष तीन पीएसएलवी मिशन की योजना बनाई गई है। वे इलेक्ट्रिक प्रोपल्शन सिस्टम का इस्तेमाल करेंगे। इसरो हाल ही में शामिल किए गए एसएसएलवी को भी लॉन्च करेगा। प्रक्षेपणों की इस श्रृंखला में चार जीएसएलवी मार्क-2 की उड़ानें और उससे भी ज्यादा शक्तिशाली एलएमवी-3 का उपयोग करके एक वाणिज्यिक मिशन शामिल है। इन कार्यक्रमों में जी-1 (या गगनयान-1) मिशन भी शामिल है, जो गगनयान कार्यक्रम की पहली मानवरहित परीक्षण उड़ान होगी। इसमें उन्नत मानव-रेटेड एलवीएम3 (एचआरएलवी3) का उपयोग किया जाएगा। इसके अतिरिक्त, इस साल तीन पीएसएलवी मिशनों की योजना बनाई गई है, जो विद्युत प्रणोदन प्रणाली, क्वांटम संचार प्रयोग और पृथ्वी अवलोकन प्रौद्योगिकियों सहित अभूतपूर्व पेलोड ले जाएंगे।

इसरो एक वाणिज्यिक भागीदार के लिए एसएसएलवी को भी लॉन्च करेगा और महत्वपूर्ण इन-फ़्लाइट एबॉर्ट सिस्टम (टीवीडी-2) का परीक्षण करने के लिए एक समर्पित मिशन का संचालन करेगा, जो गगनयान कार्यक्रम के लिए एक महत्वपूर्ण सुरक्षा सुविधा है। गगनयान कार्यक्रम की जी-1 उड़ान के लिए परीक्षण अभियान पहले ही शुरू हो चुका है। यह मानवरहित मिशन, महिलारूपी व्योममित्र को एक दबाव रहित चालक दल कक्ष में लेकर पृथ्वी की कक्षा में  जाएगा। यह उड़ान समानव उड़ान यानी एच-1 के पहले, जी-2 और जी-3 की मानवरहित उड़ानों, का मार्ग भी प्रशस्त करेगी।

गगनयान

गगनयान कार्यक्रम के साथ दो उड़ानें और जुड़ी हैं। इनमें एक है अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) के लिए एक जी-4 मिशन, और दूसरे भारतीय के लिए एक मिशन, भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन के पहले मॉड्यूल (बीएएस-1) के लिए जी-5 मिशन शामिल है। फ्लाइट जी-1 में नव विकसित उन्नत सी-32 क्रायोजेनिक अपर-स्टेज इंजन का भी परीक्षण होगा। यह महत्वपूर्ण तकनीकी प्रगति प्रणोदक (प्रोपल्शन) वहन क्षमता और थ्रस्ट को बढ़ाकर लॉन्च वाहन की वजन उठाने की क्षमताओं को बढ़ाएगी।

समानव उड़ाने के पहले चालक दल के बीच पक्के तौर पर कम्युनिकेशन की व्यवस्था को भी कायम करने की जरूरत होगी। इस सिलसिले में भारत डेटा रिले सैटेलाइट सिस्टम (आईडीआरएसएस-1) प्रक्षेपण 2025 में जीएसएलवी मार्क-2 की मदद से किया जाएगा। डेटा रिले उपग्रह प्रणाली संचार उपग्रहों का एक नेटवर्क है, जो कक्षा में स्थित अंतरिक्ष यान और पृथ्वी पर स्थित ग्राउंड स्टेशनों के बीच संपर्क का काम करेगा।

अंतरिक्ष-यात्रियों का ज़मीनी स्टेशनों से सीधे संवाद नहीं होगा, बल्कि अंतरिक्ष यान अपना डेटा रिले सैटेलाइट को भेजेंगे। रिले सैटेलाइट फिर इस डेटा को ज़मीनी स्टेशन को भेजेगा। इसकी ज़रूरत इसलिए है, क्योंकि पृथ्वी की निम्न-कक्षा में उपस्थित अंतरिक्ष यान से कई बार संपर्क टूट जाता है। भारत डेटा रिले सैटेलाइट सिस्टम ज्यादा विश्वसनीय संपर्क लिंक उपलब्ध कराएगा। अंतरिक्ष में भारत डेटा रिले सैटेलाइट सिस्टम के अलावा नासा का ट्रैकिंग एंड डेटा रिले सिस्टम (टीडीआरएसएस) और यूरोपियन डेटा रिले सिस्टम (ईडीआरएस) भी काम कर रहे हैं।

भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी टेस्ट वेहिकल डिमांस्ट्रेशन-2 (टीवीडी-2) की भी तैयारी कर रही है, जो गगनयान कार्यक्रम के लिए इन-फ्लाइट एबॉर्ट सिस्टम की परिचालन क्षमताओं को मान्य करने में एक महत्वपूर्ण कदम होगा। इसमें परीक्षण वाहन के रूप में जीएसएलवी मार्क-2 संशोधित लिक्विड विकास स्टेज (एल-40) का उपयोग किया जाएगा। इसके पहले टीवीडी-1 ने मैक 1.2 के वेग पर क्रू एस्केप सिस्टम के इन-फ्लाइट एबॉर्ट डिमांस्ट्रेशन किया था। टीवीडी-2  परीक्षण को सुपरसोनिक गति तक बढ़ाया जाएगा, मैक 1.4 के आसपास।

इसरो ने पृथ्वी की निचली कक्षा में मानव अंतरिक्ष उड़ान क्षमता का प्रदर्शन करने के लिए गगनयान कार्यक्रम शुरू किया है, जिसमें एक मानवयुक्त अंतरिक्ष यान को 5 से 7 दिनों के कक्षीय मिशन के लिए सुरक्षित रूप से एलईओ में लॉन्च किया जाएगा, उसके बाद पृथ्वी पर सुरक्षित पुनः प्रवेश और पुनर्प्राप्ति की जाएगी। पिछले साल प्रधानमंत्री ने भारतीय वायु सेना के चार अंतरिक्ष यात्रियों के नाम उजागर किए और उन्हें फरवरी 2024 में ‘स्पेस विंग्स’ से सम्मानित किया। ये चार अंतरिक्ष यात्री हैं: ग्रुप कैप्टन प्रशांत बालाकृष्णन नायर, ग्रुप कैप्टन अजीत कृष्णन, ग्रुप कैप्टन अंगद प्रताप और ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला। ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला और ग्रुप कैप्टन प्रशांत बालाकृष्णन नायर 2025 में निर्धारित अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के लिए एक्‍सीओम-4 मिशन के लिए नासा में अंतरिक्ष प्रशिक्षण ले रहे हैं।

निसार का प्रक्षेपण

इस साल निसार उपग्रह का प्रक्षेपण भी होगा, जो अब तक का सबसे शक्तिशाली पृथ्वी अवलोकन उपग्रह है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) और अमेरिकी स्पेस एजेंसी ‘नासा’ इसका प्रक्षेपण करने वाले हैं, जिसका नाम नासा-इसरो और सिंथेटिक एपर्चर रेडार (एसएआर) को मिलाकर बनाया गया है ‘निसार’। यह उपग्रह धरती की सतह पर होने वाली एक सेमी तक छोटी गतिविधियों पर नजर रखेगा। इसका प्रक्षेपण भारत के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन स्पेस सेंटर से किया जाएगा। इसे नियर-पोलर कक्षा में स्थापित किया जाएगा और अपने तीन साल के मिशन में यह हरेक 12 दिन में पूरी धरती को स्कैन करेगा।

नासा को इस सैटेलाइट के लिए एक विशेष एस-बैंड सिंथेटिक एपर्चर रेडार (एसएआर) की जरूरत थी जो भारत ने उपलब्ध कराया है। इस सैटेलाइट में अब तक का सबसे बड़ा रिफ्लेक्टर एंटेना लगाया गया है। दिलचस्प बात यह है कि इसरो का जो रॉकेट इस उपग्रह को लेकर जाएगा उसपर 1992 में अमेरिका ने प्रतिबंध लगाया था। 2200 किलो वजन के ‘नासा-इसरो सार (निसार)’ को दुनिया की सबसे महंगी इमेजिंग सैटेलाइट माना जा रहा है और यह कैलिफोर्निया में नासा की जेट प्रोपल्शन लैबोरेटरी में तैयार किया गया है।

इसके एस-बैंड और एल-बैंड सिंथेटिक एपर्चर रेडार, बादलों और वनस्पतियों को भेद सकते हैं। ‘निसार’ धरती की सतह पर ज्वालामुखियों, बर्फ की चादरों के पिघलने और समुद्र तल में बदलाव और दुनिया भर में पेड़ों-जंगलों की स्थिति में बदलाव को ट्रैक करेगा। धरती की सतह पर होने वाले ऐसे बदलावों की मॉनिटरिंग इतने हाई रिजॉल्यूशन और स्पेस-टाइम में पहले कभी नहीं की गई। इसका हाई रिजॉल्यूशन रेडार बादलों और घने जंगल के आर-पार भी देख सकेगा। इस क्षमता से दिन और रात दोनों के मिशन में सफलता मिलेगी। इसके अलावा बारिश हो या धूप, कोई भी बदलाव ट्रैक कर सकेगा। अमेरिका और भारत ने इस उपग्रह के प्रक्षेपण का समझौता 2014 में किया था।

डॉ सिंह ने कहा कि अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का योगदान साल 2023 में 8.4 अरब डॉलर का था और इसके वर्ष 2033 तक 44 अरब डॉलर तक बढ़ने का अनुमान है। अकेले साल 2023 में इस क्षेत्र में निवेश 1000 करोड़ रुपए तक पहुँच गया, जिससे भारत अंतरिक्ष क्षमताओं में वैश्विक स्तर पर अग्रणी राष्ट्र बन गया है। भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र महत्वपूर्ण विदेशी मुद्रा अर्जक के रूप में उभरा है। विदेशी उपग्रहों के प्रक्षेपण से अर्जित 220 मिलियन यूरो में से 187 मिलियन यूरो-यानी कि कुल राशि का 85 प्रतिशत पिछले आठ वर्षों में अर्जित किया गया। इसरो की सेवाओं से लाभान्वित होने वाले देशों में अमेरिका, फ्रांस, जापान आदि शामिल हैं।

एनजीएलवी

पिछले साल जब नवंबर में भारत ने जब जीसैट-20 उपग्रह का प्रक्षेपण अमेरिकी रॉकेट फैल्कन-9 की सहायता से किया, तब कुछ लोगों ने सवाल किया था कि भारत के पास क्या अपना रॉकेट नहीं है? एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स के फैल्कन-9 रॉकेट का उपयोग करके इसरो ने जीसैट-एन2 या जीसैट-20 का प्रक्षेपण 19 नवंबर को किया था। भारत ने हालांकि 430 से अधिक विदेशी उपग्रहों को लॉन्च किया है, लेकिन यह 4700 किलोग्राम भारी जीसैट-20 को अंतरिक्ष में पहुँचाने में वर्तमान भारतीय रॉकेट असमर्थ हैं। इस कारण इसरो को स्पेसएक्स के साथ साझेदारी करनी पड़ी। भारत का अपना रॉकेट ‘द बाहुबली’ या लॉन्च वेहिकल मार्क-3 (एलएमवी-3) अधिकतम 4000 से 4100 किलोग्राम तक के वजन को जियोस्टेशनरी ट्रांसफर ऑर्बिट (जीटीओ) तक ले जा सकता है।

इसरो का ऐतिहासिक दृष्टिकोण धीमी गति से विकास करने का रहा है, पर अब व्यावसायिक कारणों से परिस्थिति बदली है। नए रॉकेटों के लिए विकास में  आमतौर पर दस साल से अधिक का समय लगता है। इसके साथ ही पर्याप्त निवेश की आवश्यकता भी होती है। बहरहाल इसरो नेक्स्ट जनरेशन लॉन्च वेहिकल (एनजीएलवी) पर काम कर रहा है, जिसे प्रोजेक्ट सूर्य के नाम से भी जाना जाता है। इसके विकास के लिए कैबिनेट ने 8,239 करोड़ रुपये के बजट के साथ स्वीकृति दे दी है। इसे 10 से 24 टन तक के पेलोड को जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट (जीटीओ) तक पहुँचाकर अपनी भारी-भरकम क्षमता को बढ़ाना है। लो अर्थ ऑर्बिट (एलईओ) तक यह 30 टन तक का भार ले जा सकेगा।

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के निर्देशन में, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने पिछले साल 18 सितंबर को अगली पीढ़ी के प्रक्षेपण यान के विकास को मंजूरी दी। यह कदम भारतीय स्पेस स्टेशन की स्थापना और संचालन करने और 2040 तक चालक दल के साथ चंद्र लैंडिंग को पूरा करने की भारत की महत्वाकांक्षा को सहारा देगा। एनजीएलवी को कुल मिलाकर  8,240 करोड़ रुपये ( 99 करोड़ डॉलर) के लिए मंजूरी दी गई है। इसे 96 महीनों (8 वर्ष) में लागू किया जाएगा और इसमें कार्यक्रम प्रशासन, सुविधा स्थापना और तीन विकासात्मक उड़ानों (डी-1, डी-2 और डी-3) के लिए वित्तपोषण शामिल है।

इसकी पहली विकास उड़ान 2031 के लिए निर्धारित की गई है। यह परियोजना अभी शुरुआती चरण में है, जिसके साकार होने से पहले महत्वपूर्ण तकनीकी प्रगति और वित्तपोषण की आवश्यकता है। एनजीएलवी का पहला व्यावहारिक प्रक्षेपण 2034-2035 के आसपास संभवतः भारतीय स्पेस स्टेशन को लॉन्च करने के लिए किया जाएगा और उसके बाद 2040 के मानवयुक्त चंद्र-अभियान के लिए भी। शुरुआत में, इंजन का उपयोग कक्षा में सामग्री भेजने के लिए किया जाएगा। एकबार जब इंजन मानव-रेटिंग प्रमाणन पास कर लेगा, तब भारतीय अंतरिक्ष यात्री की चंद्रमा-यात्रा में इसका इस्तेमाल होगा। इसका मतलब है कि हमें स्वदेशी भारी और उन्नत प्रक्षेपण क्षमताओं के लिए इंतजार करना होगा।

मील के पत्थर

संभवतः 2026 में पहले मानवयुक्त गगनयान मिशन का प्रक्षेपण होगा। 2035 में भारत का अपना अंतरिक्ष स्टेशन, भारत अंतरिक्ष केंद्र बनेगा। 2047 में  चंद्रमा पर पहला भारतीय अंतरिक्ष यात्री उतरेगा।