‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान भारत ने अपनी असाधारण सैन्य शक्ति और तकनीकी दक्षता का प्रदर्शन किया, जो पाकिस्तान और आतंकवाद के प्रति भारत की नीति में एक उल्लेखनीय बदलाव है। शक्तिशाली स्वदेशी शस्त्र-प्रणालियों, अभेद्य वायु रक्षा प्रणाली और सशस्त्र बलों के अडिग दृढ़ संकल्प के साथ, भारत ने पाकिस्तान सहित पूरी दुनिया को आश्चर्यचकित कर दिया। इस ऐतिहासिक सैन्य अभियान में भारतीय सशस्त्र बलों को भारत की अंतरिक्ष-तकनीक की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। खासतौर से उपग्रहों ने जो सहायता प्रदान की, वह उल्लेखनीय है। देशी रक्षा-प्रणालियों जैसे ‘आकाशतीर वायु रक्षा प्रणाली’, एमआर-सैम, यूएएस, एल-70 एंटी एयरक्राफ्ट गन ने पाकिस्तान की कमर तोड़ दी, वहीं भारत के अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन इसरो ने भी इसमें उनकी मदद की।
11 मई को इम्फाल में केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के 5वें दीक्षा समारोह को संबोधित करते हुए इसरो प्रमुख वीएन नारायण ने कहा कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कम से कम 10 उपग्रह लगातार चौबीसों घंटे काम कर रहे थे। उन्होंने कहा, आप सभी हमारे पड़ोसियों के बारे में जानते हैं। अगर हमें अपने देश की सुरक्षा सुनिश्चित करनी है, तो हमें अपने उपग्रहों के ज़रिए सेवा करनी होगी। हमें अपने 7,000 किलोमीटर के समुद्री तट क्षेत्रों की निगरानी करनी होगी। हमें पूरे उत्तरी हिस्से की लगातार निगरानी करनी होगी। उपग्रह और ड्रोन तकनीक के बिना हम यह हासिल नहीं कर सकते।
इसरो प्रमुख ने कहा कि सभी भारतीय उपग्रहों ने पूरी सटीकता के साथ काम किया। जब हमने शुरुआत की थी, तब हमारा कैमरा रिज़ॉल्यूशन 36 से 72 सेमी के बीच था। लेकिन, एक विकासशील देश के रूप में, अब चंद्रमा पर भारत का एक कैमरा है जिसे ऑन-ऑर्बिटर हाई रिज़ॉल्यूशन कैमरा कहा जाता है। वह दुनिया का सबसे अच्छा रिज़ॉल्यूशन डिवाइस है। हमारे पास अन्य कैमरे भी हैं जो 26 सेमी रिज़ॉल्यूशन दिखा सकते हैं।
ड्रोनों की ट्रैजेक्टरी
इसरो ने शुक्रवार 16 मई को कहा, भारतीय वायु रक्षा प्रणाली ने हाल ही में हुए सैन्य संघर्ष के दौरान पाकिस्तान की ओर से दागे गए ड्रोन और मिसाइलों की बौछार के बीच मजबूत होकर एक आदर्श ढाल प्रदान की और भारतीय उपग्रहों ने सशस्त्र बलों की सहायता की, जिससे उन्हें हवाई हथियारों का सटीक प्रक्षेप पथ उपलब्ध हुआ। भारत पर हमलावर प्रक्षेपास्त्रों के सटीक प्रक्षेप पथ से भारतीय वायु रक्षा प्रणालियों को आने वाले ड्रोनों और मिसाइलों को मार गिराने में मदद मिली।
पाकिस्तान ने भारत की ओर सैकड़ों ड्रोन भेजे थे, जिनमें चीनी मिसाइलें भी शामिल थीं, लेकिन स्वदेशी ‘आकाशतीर के नेतृत्व में भारतीय वायु रक्षा प्रणाली ने उन्हें मार गिराया। अब यह बात सामने आई है कि इसरो भारत की सफलता सुनिश्चित करने के लिए उनके साथ मिलकर काम कर रहा था।
‘नाविक’ की भूमिका
भारत की स्वदेशी नेविगेशन प्रणाली, नेविगेशन विद इंडियन कांस्टिलेशन (नाविक) भी इस दौरान आधारशिला बनकर उभरी है। इसरो द्वारा विकसित, नाविक का उद्देश्य पूरे भारत में और इसकी सीमाओं से परे 1,500 किलोमीटर तक के उपयोगकर्ताओं को सटीक स्थिति, नेविगेशन और समय सेवाएँ प्रदान करना है, जो नागरिक और रक्षा दोनों आवश्यकताओं को पूरा करता है। इस प्रणाली के विकास, वर्तमान चुनौतियों और भविष्य की संभावनाओं पर हाल ही में इसरो के पूर्व अध्यक्ष एएस किरण कुमार ने चर्चा की, जिन्होंने नाविक के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
नाविक की परिकल्पना 1999 के कारगिल युद्ध के बाद की गई थी, जब भारत को अमेरिका ने अपनी जीपीएस-प्रणाली से वंचित कर दिया था। इससे विदेशी नेविगेशन सिस्टम पर निर्भर रहने की हमारी कमज़ोरी उजागर हुई थी।
चीनी उपग्रह
सेंटर फॉर जॉइंट वॉरफेयर स्टडीज के महानिदेशक अशोक कुमार के अनुसार, संघर्ष में चीन की भागीदारी केवल हथियारों की आपूर्ति से कहीं आगे तक फैली हुई थी। चीन ने पाकिस्तान को अपने रेडार और वायु रक्षा प्रणालियों को पुनर्गठित करने में मदद की ताकि देश की सेना और हथियारों की तैनाती का अधिक प्रभावी ढंग से पता लगाया जा सके। इस सहायता से पाकिस्तान कथित तौर पर भारतीय सेना की गतिविधियों और सैन्य संपत्तियों की अधिक कुशलता से निगरानी करने में सक्षम हुआ। चीन ने 22 अप्रैल के बाद पाकिस्तान को, भारत पर अपने उपग्रह कवरेज को समायोजित करने में भी मदद की थी। कुमार ने कहा कि भारत की रक्षा प्रणालियों ने संघर्ष के दौरान पाकिस्तान द्वारा सैकड़ों ड्रोनों की तैनाती का अच्छी तरह से जवाब दिया।