Defence Monitor

‘आपरेशन सिंदूर’ ने खींची लक्ष्मणरेखा

भारत और पाकिस्तान के बीच 6-7 मई की रात से लेकर 10 मई की रात तक चली चार दिन की झड़प, परमाणु संपन्न दो देशों के बीच पिछली आधी सदी में हुई सबसे व्यापक लड़ाई थी। दोनों पक्षों ने एक-दूसरे की हवाई सुरक्षा का परीक्षण करने और सैन्य सुविधाओं पर हमला करने के लिए ड्रोन और मिसाइलों का इस्तेमाल किया। इसमें इनफेंट्री का इस्तेमाल कम से कम हुआ, क्योंकि सेनाएँ अपने देश की सीमा के भीतर ही रहीं। अलबत्ता जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा पर तोपखाने का इस्तेमाल काफी हुआ।

नौसेना का इस्तेमाल भी नहीं हुआ, हालाँकि भारत ने आईएनएस विक्रांत के नेतृत्व में 36 जहाजों का बेड़ा कराची बंदरगाह पर हमला करने की स्थिति में तैनात किया था। विक्रांत के अलावा ब्रह्मोस से लैस युद्धपोतों और पनडुब्बियाँ भी इस बेड़े में शामिल थीं। भारतीय नौसेना की मजबूत उपस्थिति और उच्च सतर्कता के कारण पाकिस्तानी नौसेना को रक्षात्मक मुद्रा में आना पड़ा, जिससे उसके अधिकांश बेड़े को कराची बंदरगाह या तट के पास ही सीमित रखना पड़ा। इस ऑपरेशन ने पिछले संघर्षों की तुलना में भारत की समुद्री तैनाती में नाटकीय वृद्धि को रेखांकित भी किया। उल्लेखनीय है कि 1971 के युद्ध के दौरान, कराची के खिलाफ केवल छह भारतीय नौसैनिक युद्धपोतों को तैनात किया गया था, जबकि 2025 के ऑपरेशन में तैनात परिसंपत्तियों में छह गुना वृद्धि देखी गई, जो भारत की बढ़ी हुई नौसैनिक क्षमताओं और रणनीतिक इरादे को रेखांकित करती है।

100 आतंकी मारे गए

रक्षामंत्री राजनाथ सिंह के अनुसार, भारतीय सशस्त्र बलों की समन्वित कार्रवाई के कारण, जिसमें थलसेना और वायुसेना द्वारा पाकिस्तान और पीओके में आतंकी ढाँचे पर सटीक हमले शामिल हैं, कम से कम 100 आतंकवादी और उनके सहयोगी मारे गए। जबरदस्त समुद्री स्थिति और संयुक्त-बल तालमेल ने पाकिस्तान को युद्ध विराम की विनती करने के लिए मजबूर किया, जिस पर 10 मई को दोनों देशों ने सहमति व्यक्त की।

चार दिन की इस लड़ाई का काफी लंबे समय तक गहराई से विश्लेषण होता रहेगा, क्योंकि इसमें भविष्य के युद्धों की संभावनाएँ छिपी हुई हैं। बहरहाल दोनों देशों की वायुसेनाओं ने अपनी सीमाओं में रहते हुए ही कार्रवाई की। सबसे बड़ी भूमिका इंटेलिजेंस के लिए ड्रोनों और ड्रोन स्वार्म के इस्तेमाल की रही। वहीं काउंटर ड्रोन और एयर डिफेंस की भूमिका भी देखने को मिली। भारतीय सेनाओं ने पाकिस्तान को हरेक मामले में मात दी और चार दिन में उसके सुरक्षा तंत्र को हिलाकर रख दिया। यह लड़ाई खत्म भी पाकिस्तान का विलाप सुनने के बाद अमेरिका के अनुनय-विनय के आधार पर हुई।

जिस दिन पहलगाम का हत्याकांड हुआ देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सऊदी अरब के दौरे पर गए हुए थे। वे अपनी यात्रा को अधूरा छोड़कर फौरन देश वापस आए और उन्होंने घोषणा की इस घटना के सूत्रधारों को कठोर सजा दी जाएगी।

गुस्से की लहर

पहलगाम के हमले को लेकर पूरे देश में गुस्से की लहर थी। खासतौर से घाटी के नागरिकों ने बंद आयोजित करके पाकिस्तान को पहला जवाब दे दिया। पीएम मोदी की अध्यक्षता में बुधवार 23 अप्रेल की शाम हुई सीसीएस की बैठक में कुछ बड़े फैसले हुए। विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने इन फैसलों की जानकारी देते हुए कहा कि 1960 की सिंधु जल संधि को तत्काल प्रभाव से स्थगित तब तक रखा जाएगा, जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद के लिए अपने समर्थन को त्याग नहीं देता। सीमा पार सभी तरह की आवाजाही के लिए अटारी चेक पोस्ट को बंद कर दिया है और पाकिस्तानी नागरिकों के लिए सार्क वीजा यात्रा विशेषाधिकारों को निलंबित कर दिया गया। सार्क ढाँचे के तहत भारत में मौजूद पाकिस्तानी नागरिकों को देश छोड़ने के लिए 48 घंटे का समय दिया गया है।

राजनयिक चैनलों को न्यूनतम स्तर पर लाते हुए भारत ने सेना, नौसेना और वायु सेना सहित सभी पाकिस्तानी सैन्य सलाहकारों को निष्कासित कर दिया। दूसरी तरफ भारत के सैन्य सलाहकारों को इस्लामाबाद स्थित उच्चायोग से वापस बुला लिया गया है। ये राजनयिक फैसले थे। ज़ाहिर है कि इनके अलावा सैनिक-कार्रवाई के फैसले भी हुए होंगे। यह साफ लग रहा था कि इसबार की सैनिक-कार्रवाई यकीनन उड़ी के सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट अभियान से ज्यादा बड़ी होगी, क्योंकि उन दोनों से पाकिस्तान ने कुछ सीखा नहीं। देश के लोगों को लग रहा था कि पाकिस्तान अब लंबा सबक चाहता है। खासतौर से जनरल आसिम मुनीर के नाम कड़ा संदेश जाना चाहिए, जिन्होंने पहलगाम की घटना के एक हफ्ते पहले 15 अप्रेल को प्रवासी पाकिस्तानियों की सभी में जहरीली बातें की थीं। यह भी कि आतंकवादियों को घेरकर ठिकाने लगाना एक रणनीति है, पर असली ज़रूरत है, उन लोगों के सफाए की, जो पर्दे के पीछे हैं।

प्रधानमंत्री ने रक्षा मामलों की कैबिनेट कमेटी के अलावा अन्य विशेषज्ञों के साथ भी विमर्श किया। उधर रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने एनएसए अजित डोभाल, वायुसेना अध्यक्ष एयर चीफ मार्शल एपी सिंह, सेनाध्यक्ष जनरल उपेंद्र द्विवेदी और नौसेना प्रमुख दिनेश त्रिपाठी के साथ महत्वपूर्ण बैठक की अध्यक्षता की।

6-7 मई की रात

भारतीय सशस्त्र बलों ने मध्यरात्रि के बाद ‘ऑपरेशन सिंदूर’ संचालित किया, जिसके तहत पाकिस्तान और पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में आतंकवादियों के ठिकानों पर हमले किए गए। ये ऐसे चिह्नित स्थान हैं, जहाँ से अतीत में भारत के खिलाफ आतंकवादी हमलों की योजना बनाई गई और उन्हें निर्देशित किया जाता रहा है। भारतीय सेना ने ऐसे 21 स्थानों को चिह्नित किया है, जिनमें से नौ ठिकानों को उस रात निशाना बनाया गया।

भारत की यह कार्रवाई केंद्रित, नपी-तुली और बिना किसी उकसावे वाली रही। इस दौरान, किसी भी पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान को नुकसान नहीं पहुँचाया गया है। भारत ने अपने लक्ष्यों के चयन और उन्हें निशाना बनाने में काफी संयम दिखाया।

उस रात इन नौ जगहों पर 100 से ज्यादा आतंकी मारे गए। इस लिस्ट में लश्कर के टॉप कमांडर अबु जिंदाल और मसूद अज़हर के बहनोई मोहम्मद जमील समेत कई नाम शामिल हैं। ये पाँच नाम इस प्रकार हैं: 1. मुदस्सर खादियन खास उर्फ ​​मुदस्सर उर्फ ​​अबू जुंदाल (लश्कर-ए-तैयबा), 2. खालिद उर्फ ​​अबू अकाशा (लश्कर-ए-तैयबा), 3. हाफिज मुहम्मद जमील (जैश-ए-मोहम्मद), 4.मोहम्मद यूसुफ अज़हर उर्फ ​​उस्ताद जी उर्फ ​​मोहम्मद सलीम उर्फ ​​घोसी साहब (जैश-ए-मोहम्मद), 5.मोहम्मद हसन खान (जैश-ए-मोहम्मद)।

मुदस्सर खादियन खास उर्फ ​​मुदस्सर उर्फ ​​अबू जुंदाल लश्कर-ए-तैयबा से संबद्ध था। उसके जनाजे की नमाज एक सरकारी स्कूल में हुई, जिसका नेतृत्व जमात-उद-दावा (एक नामित वैश्विक आतंकवादी) के हाफिज अब्दुल रऊफ़ ने किया। नमाज में पाकिस्तानी सेना के एक सेवारत लेफ्टिनेंट जनरल और पंजाब पुलिस के आईजी शामिल हुए। इससे सेना और आतंकियों के सीधे रिश्ते को समझा जा सकता है।

रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने 7 मई को दिल्ली कैंट स्थित मानेकशॉ सेंटर में सीमा सड़क संगठन के 66वें स्थापना दिवस समारोह में अपने संबोधन में कहा कि ऑपरेशन सिंदूर द्वारा भारत ने अपनी भूमि पर हुए हमले का जवाब देने के स्व-अधिकार का इस्तेमाल किया है और सशस्त्र बलों ने पाकिस्तान और पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर में आतंकी प्रशिक्षण केंद्रों और शिविरों को नष्ट करने में सटीकता, सावधानी और चेतना-पूर्वक कार्रवाई कर इतिहास रच दिया है। नागरिक आबादी को नुकसान पहुँचाए बिना योजनाबद्ध तरीके से लक्ष्यों का तबाह किया गया।

भारत का लक्ष्य

‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर 7 मई को प्रेस ब्रीफिंग के दौरान, भारत ने अपनी प्रतिक्रिया को केंद्रित, संयत, नपी तुली और गैर भड़काऊ बताया था। उसमें पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठानों को निशाना नहीं बनाने का विशेष उल्लेख किया गया था। यह भी दोहराया गया कि यदि जवाब में भारत में सैन्य ठिकानों पर हमले हुए, तो किसी भी हमले का उचित उत्तर दिया जाएगा। इसके बावज़ूद पाकिस्तान ने 7-8 मई की रात ड्रोन और मिसाइलों द्वारा अवंतीपुरा, श्रीनगर, जम्मू, पठानकोट, अमृतसर, कपूरथला, जालंधर, लुधियाना, आदमपुर, भटिंडा, चंडीगढ़, नल, फलोदी, उत्तरलाई और भुज सहित उत्तरी और पश्चिमी भारत में कई सैन्य ठिकानों पर हमला करने का प्रयास किया। इन्हें एकीकृत काउंटर यूएएस ग्रिड और वायु रक्षा प्रणालियों द्वारा बेअसर कर दिया गया। कई स्थानों से बरामद मलबों ने पाकिस्तानी हमलों की पुष्टि की।

उसके फौरन बाद 8 मई की सुबह भारतीय सशस्त्र बलों ने पाकिस्तान में कई स्थानों पर वायु रक्षा रेडार और प्रणालियों को निशाना बनाया। भारत ने भी पाकिस्तान की तरह ही उसी क्षेत्र में और उसी तीव्रता से जवाब दिया। लाहौर में एक वायु रक्षा प्रणाली को निष्प्रभावी करने की जानकारी विश्वसनीय रूप से मिली। पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा, बारामूला, उड़ी, पुंछ, मेंढर और राजौरी सेक्टरों में मॉर्टार और भारी तीव्रता की तोपों का प्रयोग करते हुए नियंत्रण रेखा के निकट अकारण गोलीबारी में तेजी से बढ़ोत्तरी कर दी। पाकिस्तान की गोलाबारी के कारण तीन महिलाओं और पाँच बच्चों सहित सोलह निर्दोष लोगों की मृत्यु उस रोज हुई थी। भारत ने इस अकारण गोलाबारी का उचित उत्तर दिया।

23 मिनट में ध्वस्त

सैन्य सटीकता और तकनीकी श्रेष्ठता के ऐतिहासिक प्रदर्शन में भारतीय वायुसेना ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को अंजाम दिया, जो एक तीव्र और निर्णायक हमला था, जिसने केवल 23 मिनट में पाकिस्तान की हवाई सुरक्षा-प्रणाली को ध्वस्त कर दिया। रक्षा मंत्रालय के अनुसार, यह ऑपरेशन सीमा पार से बढ़ती शत्रुता तथा घातक पहलगाम आतंकी हमले सहित भारतीय लक्ष्यों पर ड्रोन और मिसाइल हमलों की श्रृंखला के जवाब में शुरू किया गया था।

ऑपरेशन सिंदूर ने भारतीय वायुसेना को, चीन से पाकिस्तान को मिली वायु रक्षा प्रणालियों को बाईपास करने और जाम करने की क्षमता को प्रदर्शित करने का मौका दिया। इस कार्य में चीन के उन्नत रेडार और मिसाइल प्रतिष्ठान शामिल थे। माना जाता है कि वे एचक्यू-9 या एचक्यू-16 के संस्करण हैं। परिष्कृत इलेक्ट्रॉनिक युद्ध (ईडब्ल्यू) तकनीकों और इलेक्ट्रॉनिक काउंटरमैज़र्स (ईसीएम) का उपयोग करते हुए, भारतीय सेना ने इस सुरक्षा-कवच को निष्प्रभावी बना दिया, जिससे भारतीय ड्रोन और मिसाइल बिना किसी अवरोध के विवादित हवाई क्षेत्र में गहराई तक घुसने में सक्षम हो गए। भारतीय सेना ने प्रमुख पाकिस्तानी एयरबेसों-जैसे नूर खान, रहीम यार खान, सरगोधा और स्कर्दू-के साथ-साथ रेडार स्टेशनों, गोला-बारूद डिपो और कमांड सेंटरों को निशाना बनाया। इसमें रेडार और मिसाइल सिस्टम जैसी उच्च-मूल्य वाली संपत्तियों पर ध्यान केंद्रित किया गया।

ऑपरेशन की एक उल्लेखनीय विशेषता स्वदेशी तकनीकों का इस्तेमाल था, जिसमें लंबी दूरी के ड्रोन, लॉइटरिंग म्यूनिशन और गाइडेड म्यूनिशन शामिल थे। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, इन परिसंपत्तियों ने भारतीय वायुसेना को विनाशकारी सटीकता के साथ हमला करने, दुश्मन के रेडार और मिसाइल प्रणालियों को नष्ट करने और पाकिस्तान की वायु सेना के लगभग 20% बुनियादी ढाँचे को पंगु बनाने का मौका दिया।

मानवरहित हवाई प्रणालियों, इलेक्ट्रॉनिक युद्धक परिसंपत्तियों और स्तरीकृत वायु रक्षा के एकीकरण से-जिसमें सेना और वायुसेना दोनों के संसाधनों का उपयोग किया गया-एक मजबूत बहुस्तरीय कवच का निर्माण हुआ जो अंतरराष्ट्रीय सीमा से लेकर अंदर तक फैला हुआ था और शत्रुपक्ष के ड्रोनों, मिसाइलों और विमानों को निष्क्रिय कर रहा था। यह ऑपरेशन भारतीय संपत्तियों को किसी भी तरह के नुकसान के बिना अंजाम दिया गया, जो भारत की निगरानी, ​​योजना और डिलीवरी प्रणालियों की प्रभावशीलता को रेखांकित करता है। सभी भारतीय विमान सुरक्षित वापस लौट आए, और हमलों को अत्यधिक प्रभावी और राजनीतिक रूप से संतुलित बताया गया, जिससे भारत की रणनीतिक प्रतिरोधक क्षमता और सैन्य आत्मनिर्भरता को बल मिला।

ऑपरेशन सिंदूर ने पाकिस्तान के सैन्य अभियानों में विदेशी भागीदारी की गहराई को भी उजागर किया। भारतीय वायुसेना ने चीनी मूल की पीएल-15 मिसाइलों और तुर्की मूल के यूएवी सहित अन्य सैनिक-प्रौद्योगिकियों को बेअसर किया, जिसके प्रमाण भी हैं। इससे ड्रोन और मिसाइल युद्ध में जटिल चीन-तुर्की-पाकिस्तान सहयोग पर रोशनी भी पड़ती है। इन उन्नत विदेशी आपूर्ति वाले हथियारों के बावजूद, भारत के स्वदेशी वायु रक्षा और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध नेटवर्क बेहतर साबित हुए।

पाकिस्तानी ड्रोन

सैन्य सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान ने मामूली किस्म के ड्रोनों के झुंड के बीच बेहतर गुणवत्ता के ड्रोन भेजने की रणनीति अपनाई थी, ताकि भारतीय एयर डिफेंस के सामने भ्रम की स्थिति पैदा हो। भारत ने सबको आसानी से गिरा लिया। भारत के सैन्य आक्रमण के एक दिन बाद ही पाकिस्तान ने पश्चिमी सीमा पर बारामूला से बाड़मेर तक कई स्थानों पर ड्रोन भेजना शुरू कर दिया। ऐसा चार दिनों तक जारी रहा, जिसमें युद्ध विराम पर सहमति जताए जाने के दो दिन बाद भी शामिल है। 8 मई की रात को पहली लहर में कुछ हथियारबंद ड्रोन थे, लेकिन अगली रात को भेजे गए ड्रोन की दूसरी लहर में ज़्यादा ड्रोन थे। सूत्रों ने बताया कि घुसपैठ की हर लहर में लगभग 300-400 ड्रोन झुंड में भेजे गए।

अगली दो रातों में सीमित ड्रोन घुसपैठ देखी गई। इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार इनमें से कई ड्रोन छोटे थे, जिनमें कोई कैमरा या अन्य निगरानी उपकरण नहीं था। इसका उद्देश्य रेडार की क्षमता से ज़्यादा ऑब्जेक्ट्स को आकाश में भेजना, ताकि रेडार अव्यवस्थित हो जाएँ। इसके अलावा भारतीय एयर डिफेंस की खुफिया जानकारी इकट्ठा करना और भविष्य में दोहन के लिए वायु रक्षा नेटवर्क में कमियों का पता लगाना था। सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान ने भारतीय सैन्य प्रतिष्ठानों और अन्य महत्वपूर्ण स्थानों का नक्शा बनाने के लिए भेजे गए निगरानी ड्रोनों में लाइडर (लाइट डिटेक्शन एंड रेंजिंग) तकनीक का भी इस्तेमाल किया। हालांकि सभी ड्रोनों का उद्गम स्पष्ट नहीं है, लेकिन पाकिस्तानी हमलों में तुर्की के कुछ यूएवी थे।

भारत ने विभिन्न वायु रक्षा प्लेटफार्मों और उपकरणों ने सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों और वायु रक्षा तोपों का उपयोग करते हुए, घुसपैठ के तुरंत बाद इन ड्रोनों को प्रभावी ढंग से ट्रैक किया और मार गिराया। जम्मू -कश्मीर में इनमें से ज्यादातर ड्रोनों को सेना की सोवियत मूल की एल/70 तोपों द्वारा स्वदेशी गोला-बारूद का उपयोग करके मार गिराया गया। इस प्रकार अन्य परिष्कृत और नई पीढ़ी की मिसाइलों के इस्तेमाल की जरूरत नहीं पड़ी।

ऑपरेशन जारी

10 मई की शाम को लड़ाई रुक जाने के बाद भी भारत की ओर से कहा गया कि पहलगाम के आतंकी हमले का बदला लेने के लिए भारतीय सशस्त्र बलों द्वारा शुरू किया गया ‘ऑपरेशन सिंदूर’, स्थगित हुआ है, खत्म नहीं हुआ है। भारतीय सेना ने नियंत्रण रेखा या अंतर्राष्ट्रीय सीमा को पार किए बिना सटीक हमलों के साथ आतंकवादी शिविरों और पाकिस्तानी वायु सेना के ठिकानों को नुकसान पहुँचाया। यह ऑपरेशन बड़ी सफलता साबित हुआ है। पाकिस्तान के अंदर आतंकी शिविरों और एयरबेसों पर भारत द्वारा किए गए भारी नुकसान ने पश्चिमी मीडिया को इसके प्रभाव को पहचानने पर मजबूर कर दिया।

पश्चिमी मीडिया के बड़े हिस्से ने 22 अप्रैल को आतंकवादियों द्वारा किए गए नरसंहार को ‘आतंकवादी हमला’ मानने से इनकार कर दिया था और आतंकवादियों को ‘बंदूकधारी’ और ‘चरमपंथी’ की संज्ञा दी। 22 अप्रैल के पहलगाम हमले के बाद, ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ और ‘वाशिंगटन पोस्ट’ जैसे शीर्ष मीडिया दिग्गजों ने यह रिपोर्ट करने में विफल रहे कि बैसरन के मैदानों में हत्याएं उनकी धार्मिक पहचान हिंदुओं के रूप में पता लगाने के बाद की गई थीं। बहरहाल लड़ाई रुक जाने के बाद जबकि ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ और ‘वॉशिंगटन पोस्ट’ दोनों ने माना कि पाकिस्तान की सैन्य सुविधाओं और हवाई अड्डों को निशाना बनाने में भारत के पास स्पष्ट बढ़त थी। और यह कि पाकिस्तान पर भारतीय हमलों से ‘कम से कम छह हवाई अड्डों’ के रनवे और संरचनाओं को नुकसान पहुँचा। हालाँकि, भारतीय सशस्त्र बलों ने कहा है कि जवाबी हमले के दौरान 11 पाकिस्तानी एयरबेसों पर हमला किया गया। हमारी सेना का शुरू से यह कहना था कि हमारे लक्ष्य पर आतंकी ठिकाने थे, जिनपर 6-7 मई की निशाना लगाकर हमने अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लिया। उसके बाद हमने पाकिस्तान के जवाबी हमलों का जवाब भर दिया।

वाशिंगटन पोस्ट

वाशिंगटन पोस्ट ने भारतीय जवाबी कार्रवाई का विश्लेषण करते हुए और विशेषज्ञों के हवाले से कहा कि ऑपरेशन सिंदूर भारतीय भूखंड के दो देशों के बीच दशकों से चल रहे संघर्ष में अपनी तरह का सबसे महत्वपूर्ण हमला था। इसमें दो दर्जन से ज़्यादा सैटेलाइट तस्वीरों और उसके बाद के वीडियो की समीक्षा से पता चला है कि हमलों में तीन हैंगर, दो रनवे और वायुसेना द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली दो मोबाइल इमारतों को भारी नुकसान पहुँचा है। भारत द्वारा हमला किए गए कुछ ठिकाने देश के 100 मील अंदर तक थे। इसमें किंग्स कॉलेज लंदन में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के वरिष्ठ व्याख्याता वॉल्टर लैडविग का हवाला देते हुए कहा गया है कि चार दिवसीय हवाई हमले ‘1971 के युद्ध के बाद से पाकिस्तानी सैन्य बुनियादी ढाँचे पर सबसे व्यापक भारतीय हवाई हमले थे।’

रिपोर्ट के अनुसार, सशस्त्र संघर्ष पर नज़र रखने के लिए उपग्रह इमेजरी का उपयोग करने वाली शोध परियोजना, कॉन्टेस्टेड ग्राउंड के भू-स्थानिक विश्लेषक विलियम गुडहिंड ने कहा कि भारत ने पाकिस्तान की आक्रामक और रक्षात्मक हवाई क्षमताओं को गंभीर रूप से कम करने के उद्देश्य से उच्च-स्तरीय लक्ष्यों पर सटीक हमले किए। इस्लामाबाद के ठीक बाहर रावलपिंडी के नूर खान एयर बेस पर दो मोबाइल नियंत्रण केंद्र नष्ट कर दिए गए। इसे भारत द्वारा परिचालन विवरण के खुलासे से मेल खाते हुए कहा गया है।

विशेषज्ञों के अनुसार, पाकिस्तान का नूर खान एयरबेस देश के सबसे महत्वपूर्ण एयरबेस में से एक है क्योंकि यह सेना का केंद्रीय परिवहन केंद्र है। यह बेस स्ट्रैटेजिक प्लांस डिवीजन के करीब है, जो देश के परमाणु हथियारों की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार इकाई है। पाकिस्तान में भोलारी और शाहबाज एयरबेस को भारी नुकसान पहुँचा है, तथा विमान हैंगर के रूप में इस्तेमाल की जाने वाली इमारतें नष्ट हो गई हैं। भोलारी स्थित हैंगर की छत पर लगभग 60 फुट चौड़ा एक बड़ा छेद दिखाई दे रहा है, जिसके बारे में विशेषज्ञों का कहना है कि यह मिसाइल के हमले के कारण हुआ है।

वॉल्टर लैडविग ने कहा कि भारत ने पहले (पुलवामा आतंकी हमले के बाद) अपने हवाई अभियानों को पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर या पाकिस्तान के दूरदराज के हिस्सों तक सीमित कर दिया था; हालांकि, ऑपरेशन सिंदूर के तहत, भारतीय सेना ने पाकिस्तान में सैन्य ठिकानों पर ‘एक ही बार में’ हमला किया, जो महत्वपूर्ण बदलाव को प्रकट करता है। भारत आतंकवादी हमलों को पारंपरिक सैन्य प्रतिशोध के आधार के रूप में देख रहा है।

शहरी युद्ध अध्ययन के अध्यक्ष जॉन स्पेंसर ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर कब्जे या शासन परिवर्तन के बारे में नहीं था, बल्कि यह ‘विशिष्ट उद्देश्यों के लिए किया गया एक सीमित युद्ध’ था। उन्होंने यह भी कहा कि जो लोग कहते हैं कि भारत को और आगे जाना चाहिए था, वे इस मुद्दे को समझने में चूक करते हैं। उन्होंने एक्स पर पोस्ट किया, सामरिक सफलता विनाश का पैमाना नहीं है। वांछित राजनीतिक प्रभाव हासिल करने से जुड़ी है। भारत का संयम कमजोरी नहीं है, बल्कि परिपक्वता है। भारत ने सिर्फ़ हमले का जवाब नहीं दिया। इसने रणनीतिक समीकरण को बदल दिया।

न्यूयॉर्क टाइम्स

न्यूयॉर्क टाइम्स में एग्नेस चैंग, पाब्लो रॉबल्स और मुजीब मशाल की रिपोर्ट काफी हद तक संतुलित है। इसमें कम से कम इतना माना गया है कि सैटेलाइट इमेजरी से पता चलता है कि हमले व्यापक थे, लेकिन नुकसान दावे से कहीं ज़्यादा सीमित थे-ऐसा लगता है कि ज़्यादातर हमले भारत ने पाकिस्तानी ठिकानों पर किए थे। हाई-टेक युद्ध के नए दौर में, दोनों पक्षों द्वारा किए गए हमले सटीक निशाना साधते हुए दिखाई दिए। हालांकि इस रिपोर्ट में इस विषय पर ज्यादा जानकारी नहीं है कि कुछ हवाई अड्डों पर हैंगरों को हुई क्षति से उनके भीतर रखे विमानों को नुकसान हुआ होगा या नहीं। कुछ भारतीय रक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि भोलारी एयरबेस पर पाकिस्तान के अवॉक्स यानी साब एराई और एफ-16 विमानों को ज़रूर क्षति पहुँची होगी।

भारतीय सेना ने कहा कि उसने पाकिस्तान के कुछ प्रमुख हवाई अड्डों पर रनवे और अन्य सुविधाओं को खास तौर पर निशाना बनाया है। सैटेलाइट तस्वीरों में नुकसान दिखाया गया है। 10 मई को पाकिस्तान ने रहीम यार खान हवाई अड्डे के लिए एक नोटिस जारी किया जिसमें कहा गया कि रनवे चालू नहीं है।

नूर खान अड्डा, पाकिस्तानी सेना के मुख्यालय और देश के प्रधानमंत्री के कार्यालय से लगभग 15 मील की दूरी पर है तथा पाकिस्तान के परमाणु शस्त्रागार की देखरेख और सुरक्षा करने वाली इकाई से भी कुछ ही दूरी पर है , तथा संभवतः यह सबसे संवेदनशील सैन्य लक्ष्य था जिस पर भारत ने हमला किया।

पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में सरगोधा एयरबेस के बारे में भारतीय सेना ने कहा कि उसने रनवे के दो हिस्सों पर हमला करने के लिए सटीक हथियारों का इस्तेमाल किया था। जहाँ भारत को स्पष्ट बढ़त मिली, वह पाकिस्तान की सैन्य सुविधाओं और हवाई अड्डों को निशाना बनाने में थी, क्योंकि बाद की लड़ाई प्रतीकात्मक हमलों और शक्ति प्रदर्शन से बदलकर एक-दूसरे की रक्षा क्षमताओं पर हमलों में बदल गई।

पाकिस्तान की सेना ने दो दर्जन भारतीय सैन्य प्रतिष्ठानों और ठिकानों की सूची दी है, जिनके बारे में उसने कहा है कि उनके बलों ने उन्हें निशाना बनाया है। जबकि भारतीय अधिकारियों ने चार हवाई ठिकानों पर ‘सीमित क्षति’ की बात स्वीकार की है। जिन स्थलों पर पाकिस्तान ने हमला करने का दावा किया है, उनके उपग्रह चित्र सीमित हैं, तथा अभी तक पाकिस्तानी हमलों से हुए नुकसान को स्पष्ट रूप से नहीं दिखा पाए हैं। यहाँ तक ​​कि उन ठिकानों पर भी नहीं जहाँ सैन्य कार्रवाई के पुष्ट प्रमाण मौजूद थे।

सरकारी मीडिया के अनुसार, पाकिस्तानी अधिकारियों ने कहा कि उनकी सेना ने भारत के उधमपुर एयरबेस को ‘नष्ट’ कर दिया है। एक भारतीय सैनिक के परिवार ने बेस पर उसकी मौत की पुष्टि की है। लेकिन 12 मई की तस्वीर में नुकसान नहीं दिख रहा है। हमलों से पहले और बाद की हाई-रिज़ॉल्यूशन सैटेलाइट तस्वीरों से पता लगता है कि भारतीय हमलों से पाकिस्तान के ठिकानों को स्पष्ट नुकसान पहुँचा है, हालांकि ये हमले सीमित और सटीक प्रकृति के हैं। पाकिस्तान के बंदरगाह शहर कराची से 100 मील से भी कम दूरी पर स्थित भोलारी एयर बेस पर भारत के रक्षा अधिकारियों ने कहा कि उन्होंने एक विमान हैंगर पर सटीक हमला किया है। तस्वीरों में हैंगर जैसी दिखने वाली जगह पर स्पष्ट क्षति दिखाई दे रही है।

सुखोई-30 का प्रदर्शन

उपरोक्त अमेरिकी स्रोतों और भारतीय सेना के अलावा निजी क्षेत्र के भारतीय रक्षा स्रोतों ने जानकारियाँ भी दी हैं। उनके अनुसार भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तानी क्षेत्र में काफी अंदर तक सटीक हमले किए। भारत का भारी वजन वाला बहुद्देश्यीय लड़ाकू विमान सुखोई-30एमकेआई इन ऑपरेशनों का मुख्य केंद्र बनकर उभरा, जिसने अपनी रक्षा और आक्रामक क्षमता दोनों का प्रदर्शन किया। जोधपुर स्क्वॉड्रन ने विशेष रूप से ब्रह्मोस हमले में योगदान दिया। राफेल के शामिल होने से पहले भी सुखोई-30एमकेआई भारतीय वायुसेना का प्राथमिक फ्रंटलाइन विमान रहा है। इसकी इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमताओं और चपलता ने इसे फ्रंटलाइन प्लेटफ़ॉर्म के रूप में इसबार भी स्थापित किया है, जो आधुनिक वायु रक्षा के खिलाफ़ सफल होने में समर्थ है।

बड़े रेडार क्रॉस-सेक्शन के बावजूद-जो राफेल जैसे विमान से लगभग डेढ़ गुना बड़ा है-सुखोई-30एमकेआई को पाकिस्तानी रेडार सिस्टम पकड़ नहीं पाए। विमान के उन्नत इलेक्ट्रॉनिक युद्ध (ईडब्लू) सूट, जिसमें ईएलएम-8222 पॉड शामिल है, और इसकी सुपर-पैंतरेबाजी ने इसे जटिल खतरों से बचने में समर्थ बनाया। पाकिस्तानी सेना ने चीनी मूल की पीएल-15ई बियॉन्ड विजुअल रेंज हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइलों और एचक्यू-9बीई सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों का इस्तेमाल किया। दोनों ही पाकिस्तान के वायु रक्षा नेटवर्क की रीढ़ हैं। सुखोई-30एमकेआई ने मिसाइल लॉक और रेडार ट्रैकिंग को विफल करने के लिए उच्च-जी युद्धाभ्यास, गति और दिशा में तेजी से बदलाव और उन्नत ईसीएम का इस्तेमाल किया।

भारतीय मीडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार बठिंडा के पास एक उल्लेखनीय मुठभेड़ में, पाकिस्तानी जेएफ-17 ने सुखोई पर पीएल-15ई मिसाइलें दागीं, लेकिन भारतीय पायलट ने बैरल रोल और ईडब्ल्यू जैमिंग का उपयोग करके मिसाइल लॉक को तोड़ दिया। कश्मीर के ऊपर एक अन्य घटना में, सुखोई ने रेडार ब्लाइंड स्पॉट का फायदा उठाते हुए कम ऊँचाई पर उड़ान भरकर एचक्यू-9बीई सैम को सफलतापूर्वक निरर्थक कर दिया।

ब्रह्मोस क्रूज़ मिसाइल

ब्रह्मोस एयर-लॉन्च क्रूज मिसाइल ने हमलों में साथ निर्णायक भूमिका अदा की। 10 मई की सुबह, पाकिस्तानी रक्षा-ढाँचे पर शुरुआती हमलों के बाद, सुखोई-30एमकेआई ने तीन महत्वपूर्ण पाकिस्तानी एयरबेस पर ब्रह्मोस मिसाइलें दागीं। सुखोई से हवाई तैनाती के लिए विशेष रूप से संशोधित ब्रह्मोस-ए, एक सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है जिसकी रेंज 500 किमी तक है और इसका वॉरहैड 300 किलोग्राम है। इसकी गति (मैक 3 तक) और इसकी सटीकता के कारण इसे उन्नत वायु रक्षा प्रणालियाँ भी रोक नहीं पाती हैं। अपने हवाई अड्डों की विनाश देखते हुए पाकिस्तानी डीजीएमओ को युद्ध-विराम की विनती करनी पड़ी।