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जम्मू क्षेत्र में एक और ‘ऑपरेशन सर्पविनाश’ की जरूरत

पिछले कुछ दिनों में कश्मीर के जम्मू इलाके में आतंकवादी घटनाएं बढ़ गई हैं। इसमें दो राय नहीं कि इनके पीछे पाकिस्तानी सेना का हाथ है, पर सवाल है कि क्यों? हाल में हुए हमलों की जिम्मेदारी ‘कश्मीर टाइगर्स’ नाम के एक ग्रुप ने ली है, जो वस्तुतः जैश-ए-मोहम्मद का छाया-समूह है। कुल मिलाकर यह सारा काम पाकिस्तानी सेना की खुफिया शाखा आईएसआई द्वारा संचालित और निर्देशित है।

यह इलाका कश्मीर घाटी से दूर है। घाटी में शांति-स्थापना के बाद पाकिस्तानी सत्ता-प्रतिष्ठान की नजरें इस इलाके में गई हैं, जहाँ इस सदी के शुरूआती वर्षों में सक्रिय रहने के बाद उसने अपनी हार मान ली थी। भारतीय सेना ने भी यहाँ शांति देखकर पिछले दिनों बड़ी संख्या में अपने सैनिकों को हटाकर चीनी सीमा से जुड़े लद्दाख के इलाके में तैनात कर दिया है। इसका फायदा उठाकर पाकिस्तान ने घुसपैठ कराई है।

यह सवाल पूछा जा रहा है कि जम्मू-कश्मीर में करीब 35 साल के अनुभव के बावजूद सेना को ऐसी परिस्थितियों का सामना क्यों करना पड़ा है? साथ ही यह भी कि पाकिस्तानी सेना अब जम्मू-क्षेत्र को निशाना क्यों बना रही है? केवल जुलाई में ही चार बड़े आतंकी हमलों ने लोगों को डरा दिया है। लगता यह है कि भारत सरकार के 5 अगस्त, 2019 के फैसले के बाद पाकिस्तानी सेना की सारी योजनाएं एक साथ फेल हो गईं। अब वह अपने महत्व को बनाए रखने के लिए नए रास्ते खोज रही है।

जम्मू के इस इलाके में घने जंगल हैं, जिनमें छिपना और बचना आसान है। यह इलाका नियंत्रण रेखा और अंतरराष्ट्रीय सीमा दोनों के पास है, इसलिए बचकर आना-जाना भी आसान है। पाकिस्तान अपने छायायुद्ध को अब नए तरीके से लड़ने की योजना बना रहा है। इसके जवाब में भारत को भी अपनी दीर्घकालीन रणनीति को तैयार करना होगा। संभव है कि भारतीय सुरक्षा बल जल्द ही कोई बड़ा ऑपरेशन करें।

बढ़ते हमले

2022 और 23 में जहाँ सुरक्षा बलों पर केवल तीन हमले हुए थे, वहीं इस साल छह हमले हो चुके हैं। इस साल जनवरी में तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल मनोज पांडे ने माना था कि इस इलाके में आतंकी गतिविधियाँ बढ़ी हैं, जबकि 2003 में उनपर पूरी तरह काबू पा लिया गया था। उन्होंने यह भी माना था कि हमारे दुश्मन अब सक्रिय हैं और जहाँ घाटी में स्थिति सामान्य हो रही है वे इस इलाके में ‘प्रॉक्सी तंज़ीमों’ को बढ़ावा दे रहे हैं। इसके साथ ही 2021 में यहाँ से सेना के दस्तों को चीन की सीमा पर भेजने के बाद से आतंकियों पर दबाव भी कम हो गया है। माना जाता है कि यहाँ से करीब 4000 से 5000 सैनिक हटाए गए हैं। अब इस इलाके में सैनिकों की संख्या बढ़ाई भी जाएगी, तो उन्हें आतंकवाद-विरोधी कार्रवाइयों का प्रशिक्षण भी देना होगा।

जम्मू को कश्मीर की घाटी के मुकाबले शांत इलाका माना जाता रहा है। अनुच्छेद 370 हटने के बाद से सुरक्षाबलों ने कश्मीर में आतंकवाद का सफाया करने के लिए बड़े पैमाने पर ऑपरेशन चलाया। इस ऑपरेशन से बौखलाए आतंकी संगठनों ने अब अपनी स्ट्रैटजी बदल दी है, अब वे हिंदू बहुल क्षेत्र जम्मू को निशाना बना रहे हैं। जम्मू कश्मीर के पूर्व डीजीपी एसपी वैद्य का कहना है कि इससे इनकार नहीं किया जा सकता है कि इस पूरे मामले में पाकिस्तान और चीन की मिलीभगत हो। दरअसल लद्दाख में भारत-चीन सीमा पर और कश्मीर में जिस तरह से सुरक्षाबलों ने मोर्चा संभाला है, उससे पाकिस्तान और चीन दोनों ही दबाव में हैं। पाकिस्तान में बैठे आतंकी संगठन चाहते हैं कि इस पूरे दबाव को जम्मू की ओर शिफ्ट किया जाए।

जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद से घाटी के इलाकों में आतंकी हमलों में कमी आई थी। बीते पाँच साल की बात करें तो सेना ने 700 से ज्यादा आतंकी मार गिराए। वर्ष 2020 में सुरक्षाबलों ने 221 आतंकी ढेर कर दिए, वहीं 2021 में 180 आतंकी मारे गए। इसके अलावा 2022 में 193 आतंकियों का सफाया कर दिया गया तो वहीं 2023 में कुल 87 आतंकी मारे गए। इसके अलावा इस साल 13 जुलाई तक 27 आतंकी मारे जा चुके हैं।

कठुआ और डोडा

गत 8 जुलाई को कठुआ में हुए आतंकी हमले के बारे में अधिकारियों का कहना है हथियारों से लैस आतंकियों की ओर से हुए हमले के बाद जवानों ने खुद को संभाला। भारतीय जवानों ने घायल साथियों को बचाने के लिए पाँच हजार से ज्यादा गोलियां चलाईं। इस हमले में जूनियर कमीशंड अधिकारी समेत पाँच सैनिक शहीद हो गए थे। यह जम्मू रीजन में एक महीने में हुआ पाँचवां आतंकी हमला था। घायल जवानों का पठानकोट के सेना अस्पताल में इलाज चल रहा है। जवानों ने घायल होने के बावजूद बहादुरी का परिचय दिया। शहीद होने वाले नायब सूबेदार आनंद सिंह, राइफलमैन अनुज नेगी,नायक विनोद सिंह, हवलदार कमल सिंह और राइफलमैन आदर्श नेगी शामिल थे। ये सभी सैनिक गढ़वाल राइफल्स के थे।

इसके बाद 15 जुलाई को डोडा के देसा वन क्षेत्र में हुई मुठभेड़ ने देश का ध्यान खींचा है, जिसमें सेना के एक कैप्टेन सहित चार जवान वीर गति को प्राप्त हो गए थे। इससे पहले कठुआ के पहाड़ी क्षेत्र बदनोटा में आतंकियों ने सैन्य वाहन पर हमला किया था, जिसमें पाँच जवान शहीद हुए थे। गत 9 जून को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने तीसरे कार्यकाल की शपथ ले रहे थे, उसी दिन रियासी जिले में एक बस पर आतंकी हमला हुआ था, जिसमें नौ तीर्थयात्रियों की मृत्यु हुई थी और  42 लोग घायल हो गए थे।

बौखलाया पाकिस्तान

जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 खत्म होने के बाद से पाकिस्तान पूरी तरह बौखला गया है। उसकी पहली कोशिश है कि घाटी में अशांति बनी रहे, पर इसमें वह फिलहाल विफल है। दूसरी तरफ जम्मू क्षेत्र में काफी लंबे समय तक शांति बनी रही थी। सवाल है कि इस समय अचानक यहाँ हो रहे हमलों का मतलब क्या है? डोडा और कठुआ में हुए आतंकी हमलों की जिम्मेदारी कश्मीर टाइगर्स ने ली थी, वहीं, पीपुल्स एंटी-फासिस्ट फ्रंट ने पुंछ-राजौरी हमले की जिम्मेदारी ली। ये दोनों आतंकी समूह जैश-ए-मोहम्मद के फ्रंट माने जाते हैं। इनके नाम कुछ भी हों, इसमें दो राय नहीं कि इन हमलों के पीछे पाकिस्तानी सेना के खुफिया संगठन आईएसआई की भूमिका है।

इन आतंकी समूहों की कोशिश है कि अलग-अलग फ्रंट बनाकर भारतीय सुरक्षा-व्यवस्था को कमज़ोर किया जाए। खुफिया रिपोर्टों के मुताबिक़, जून के महीने में पाकिस्तान में दो बड़ी मीटिंगें हुई थीं। एक बैठक लाहौर में लश्कर के अब्दुल रहमान मक्की ने की तो दूसरी बैठक जैश के मुफ़्ती अब्दुल रऊफ़ ने बहावलपुर में। लश्कर-ए-तैयबा ने अपनी मीटिंग में कश्मीर में ज्यादा से ज्यादा हथियार पहुँचाने का फैसला किया था। जैश की बैठक का एजेंडा भी एम-4 कार्बाइन को घाटी में भेजना था। ये दोनों बैठकें आईएसआई की सरपरस्ती में हुई थीं।

जम्मू का इलाका नदियों वाला है। मॉनसून के समय पाकिस्तान सीमा पर ज्यादातर नदियां उफान पर रहती है, जिसकी वजह से आतंकियों को घुसपैठ करने में आसानी होती है। जम्मू क्षेत्र में खुफिया जानकारी मौजूद नहीं है। आतंकी सॉफ्ट टारगेट को निशाना बना रहे हैं। उनके निशाने पर अस्थायी चौकियाँ, वाहन और यहाँ तक ​​कि नागरिक भी हैं। आतंकवादी नागरिकों के रूप में प्रवेश करते हैं और स्थानीय गाइडों की मदद से छिपने के जगह और हथियार जमा करते हैं।

अनुमान यह भी है कि लोकसभा चुनाव में कश्मीर घाटी में भारी मतदान के बाद पाकिस्तान हताशा में विधानसभा चुनाव के पहले माहौल खराब करने के लिए जम्मू इलाके में हमलों को अंजाम दे रहा है। पाकिस्तान कभी नहीं चाहेगा कि यहां विधानसभा चुनाव हों या शांति बनी रहे। यहां विधानसभा चुनाव भी शांति से संपन्न हुए, तो कश्मीर में पाकिस्तान का एजेंडा जो थोड़ा बहुत बचा है, पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। दूसरी तरफ भारतीय सेना सीमा पार से आ रहे आतंकियों की ट्रैकिंग कर रही है। घाटी में स्थानीय लोगों की मदद से सेना घुसपैठियों पर नजर रख रही है। इसे भंग करने की कोशिशें भी पाकिस्तान की ओर से हो रही हैं।

पाँच बड़े हमले

इस साल जम्मू और कश्मीर में अब तक पाँच बड़े आंतकी हमले हो चुके हैं। इनमें सबसे पहला हमला 4 मई को हुआ था। इस हमले में एक वायुसेना के एक अधिकारी की मौत हो गई थी। यह हमला पुंछ में किया गया था। डोडा जिले में 12 जून के बाद से सिलसिलेवार आंतकी हमले देखे जा रहे हैं, जब चत्तरगला दर्रे में आतंकवादी हमले में छह सुरक्षाकर्मी घायल हो गए थे। इसके अगले दिन गंडोह में हुई गोलीबारी में भी एक पुलिसकर्मी घायल हो गया था। इसके बाद, 26 जून को जिले के गंडोह इलाके में दिन भर चले अभियान में तीन आतंकवादियों को ढेर कर दिया गया था, जबकि नौ जुलाई को घड़ी भगवा जंगल में एक और मुठभेड़ हुई थी। इस वर्ष की शुरुआत से अब तक जम्मू प्रांत के छह जिलों में लगभग 12 आतंकवादी हमलों में 11 सुरक्षाकर्मियों, एक ग्राम रक्षा गार्ड और पाँच आतंकवादियों सहित कुल 27 लोग मारे गए हैं। इन मृतकों में नौ जून को रियासी जिले के शिव खोड़ी मंदिर से लौट रहे सात तीर्थयात्री भी शामिल हैं।

जम्मू के डोडा, किश्तवार, पुंछ, राजौरी, रियासी, कठुआ के मुश्किल भौगोलिक इलाकों में पिछले दो दशक में जैश-ए-मोहम्मद और लश्करे तैयबा ने ओवर ग्राउंड वर्कर का नेटवर्क खड़ा किया है। इस नेटवर्क के जरिए सीमा पार से आकर आतंकी जम्मू-कश्मीर में आतंकी हमलों को अंजाम दे रहे हैं। जहाँ कश्मीर में ऊँचे पहाड़ों का फायदा आतंकी उठाते हैं, वहीं, जम्मू का ज्यादातर इलाका घने जंगलों से घिरा हुआ है। इन भौगोलिक क्षेत्रों में आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई करना सेना के लिए एक चुनौती है। घने जंगलों में आतंकियों पर नजर बनाए रखना काफी मुश्किल है। घाटी में छिपने के लिए आतंकी स्थानीय लोगों की मदद भी लेते हैं।

एम-4 कार्बाइन का इस्तेमाल

जम्मू के आतंकी हमलों में आतंकियों ने एम-4 कार्बाइन का इस्तेमाल किया। एम-4 कार्बाइन अमेरिकी गन है और नेटो के सैनिक इसका इस्तेमाल करते हैं। इस अमेरिकी कार्बाइन को 1980 के दशक में डिजाइन किया गया था। आतंकी इसमें स्टील कोर की गोलियों का इस्तेमाल कर रहे हैं। एक अधिकारी के मुताबिक स्टील कोर की गोलियां वाहनों को आराम से भेद देती हैं। 2021 में तालिबानी विजय के बाद जब अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना वापस हुई, तो अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान में बड़ी संख्या में एम-4 कार्बाइन, एम-24 स्नाइपर, एम-16A4 राइफल, एम-249 मशीन गन, एम-16 ए2/ए4 असॉल्ट राइफलें छोड़ गए थे। बड़ी संख्या में नाइट विजन डिवाइस, सर्विलांस डिवाइस, बायोमीट्रिक एंड पोज़ीशनिंग उपकरण भी अफगानिस्तान में छोड़ गए थे।

अमेरिकी एम-4 कार्बाइन की कश्मीर में पहली बरामदगी 2017 में हुई थी। सुरक्षाबलों ने जैश सरगना मसूद अज़हर के भतीजे तलहा रशीद मसूद को पुलवामा में ढेर किया था। उसके पास से यह कार्बाइन बरामद हुई थी। हाल में कठुआ और रियासी में हुए हमलों में भी इसी कार्बाइन का इस्तेमाल किया गया। पिछले साल पुंछ में हुए आतंकी हमले में भी इस कार्बाइन का प्रयोग हुआ था।

अंदेशा है कि एम-4 कार्बाइन के साथ ही नाइट विजन डिवाइस और सर्विलांस डिवाइसें भी आतंकियों के हाथ तक पहुंची हैं। पाकिस्तानी आतंकवादियों को ये हथियार केवल मिले ही नहीं है, बल्कि उन्हें उनके संचालन की ट्रेनिंग भी दी गई है। 2022 के बाद से एम-4 इस्तेमाल की घटनाएं बढ़ी हैं और तभी से सुरक्षा-एजेंसियाँ इस बात को लेकर सावधान हैं। यों 2017 में देखा गया था कि आतंकियों के पास एम-4 कार्बाइन हैं। तब उनकी संख्या सीमित थी। 2022 के बाद से यह संख्या काफी बड़ी हो गई है। एम-4 कार्बाइन की रेंज करीब 600 मीटर है और ये क्लोज एनकाउंटर में इस्तेमाल होती हैं।

नवीनतम घटनाक्रम

भारत सरकार ने अब इस तरफ ध्यान दिया है और कार्रवाई शुरू कर दी है। क्षेत्र में आतंकवादियों की तलाश में भारतीय सेना ड्रोन और हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल कर रही है, क्योंकि आतंकी पहाड़ियों की ऊंचाई पर बैठकर सेना को निशाना बना रहे हैं। आतंकियों की खोज में स्नाइपर डॉग यूनिट को भी लगाया गया है। जम्मू कश्मीर पुलिस ने डोडा जिले में अलग-अलग आतंकी हमलों के सिलसिले में आतंकवादी संगठनों के सक्रिय सदस्यों के नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई करते हुए चार लोगों को गिरफ्तार किया है।

पुलिस के एक प्रवक्ता ने बताया,  पुलिस ने जून और जुलाई में हुए हमलों के मद्देनज़र आतंकवादी संगठनों के सक्रिय सदस्यों के नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई तेज कर दी है। गंडोह थाने में 12 जून को भारतीय दंड संहिता, हथियार कानून और गैर कानून गतिविधियां निवारण कानून की विभिन्न धाराओं के तहत एक प्राथमिकी दर्ज की गई थी। उसके बाद 18 और 20 जून को तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया। वे अभी भद्रवाह जिला जेल में न्यायिक हिरासत में हैं। 26 जून को गंडोह पुलिस स्टेशन में एक और प्राथमिकी दर्ज की गई और 14 जुलाई को एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया गया। वह पुलिस हिरासत में है और जांच में प्रगति के साथ ही और गिरफ्तारी हो सकती हैं।

दो दशक पहले भारतीय सेना ने इन्हीं जंगलों में आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन चलाकर उनकी कमर तोड़ी थी। 2003 में भारतीय सेना ने सीमा पार से घुसपैठ कर आए आतंकवादियों को खदेड़ने के लिए ‘ऑपरेशन सर्पविनाश’ शुरू किया था। तब आतंकवादियों ने पीर पंजाल रेंज के दक्षिण में घने जंगलों में, विशेष रूप से पुंछ के हिलकाका क्षेत्र में अपने शिविर स्थापित कर लिए थे। इस बार भी आतंकवादियों ने गुफाओं के अंदर कई ठिकाने बना लिए हैं। उन्होंने प्रवासी बक्करवालों के ढोक (मनुष्यों और मवेशियों के लिए आश्रय) में बंकर बनाए और एक संचार नेटवर्क स्थापित किया।

मेंढर के दक्षिण में हिलकाका के जरिये पीर पंजाल रेंज तक जाने वाले क्षेत्र नियंत्रण रेखा के पार से कश्मीर घाटी में घुसपैठियों के लिए पहुंच के सबसे छोटे रास्तों में से एक है। आतंकवादियों ने शिविर स्थापित करने के लिए इस क्षेत्र को जानबूझकर चुना है। इस क्षेत्र पर कब्ज़ा करने से संभवतः पाकिस्तान द्वारा सैन्य अभियान की स्थिति में उनको एक रास्ता मिल सकता है और आतंकवादियों की घुसपैठ आसान हो सकती है। घने जंगल और खड़े पहाड़ उनके मददगार होते हैं। जब भारतीय सेना इलाके में तलाशी लेती है, तब आतंकवादी वहां छिप जाते हैं और सेना पर हमले करते हैं।

पीर पंजाल की दक्षिणी पहाड़ियों में बड़ी-बड़ी चट्टानों से सुरंगें और गुफाएं बनी हैं, जिनका इस्तेमाल 90 के दशक में सीमा पार से घुसपैठ करने वाले आतंकी करते थे। उस समय यहां आतंक-रोधी ग्रिड बनाई गई थी लेकिन खात्मे के बाद हटा ली गई। इलाके में शांति आने के बाद सेना की तैनाती भी कम कर दी गई लेकिन अब सेना की कमी से आतंकियों ने फिर यहां ठिकाना बना लिया है। हाल में सीमा पार से करीब 50 आतंकियों ने घुसपैठ की है। इस समय राजौरी, पुंछ में 12 और डोडा, रियासी में 20 आतंकियों के छिपे होने की आशंका है।

ऑपरेशन सर्पविनाश’

2003 में जब जनरल एनसी विज सेना प्रमुख थे, उस समय लेफ्टिनेंट जनरल रुस्तम नानावती के नेतृत्व में उत्तरी कमान ने आतंकवाद प्रभावित पहाड़ी इलाकों को खाली करने के लिए जम्मू-कश्मीर के राजौरी-पुंछ सेक्टर में ‘ऑपरेशन सर्पविनाश’ शुरू किया था। इसमें आतंकवादियों को निशाना बनाने के लिए पीर पंजाल रेंज के दोनों किनारों पर सेना तैनात की गई थी। सेना ने अप्रैल 2003 से जम्मू-कश्मीर में अपना अब तक का सबसे बड़ा आतंकवाद-रोधी अभियान चलाया था। पीर पंजाल रेंज की वजह से इसे सेना का पीर पंजाल पंच भी कहते हैं।

लगभग तीन महीने तक इस अभियान को चलाया गया। 15वीं कोर और 16वीं कोर के लगभग 10,000 सैनिक इस अभियान में शामिल थे। एमआई-17 हेलीकॉप्टरों का इस्तेमाल आतंकवादियों द्वारा कब्जे में लिए गए बक्करवाल गाँव हिलकाका में सैनिकों को एयरलिफ्ट करने के लिए किया गया था। घुसपैठियों द्वारा बनाए गए कंक्रीट बंकरों को नष्ट करने के लिए भी हेलीकॉप्टरों का इस्तेमाल किया गया था।  इस अभियान में करीब 100 आतंकवादी मारे गए। विभिन्न प्रकार के हथियार, विस्फोटकों के ढेर, करीब 7,000 किलोग्राम राशन, दवाइयां और संचार उपकरण सहित काफी सामान बरामद किया गया था। अभियान में 40-50 आतंकवादी ठिकाने ध्वस्त कर दिए गए। इस अभियान ने इस इलाके को आतंकवादियों से खाली कर दिया था। इलाके में शांति स्थापित हो गई, जो 2017-18 तक चली। अब 2021 के बाद से इस क्षेत्र में फिर से हमले शुरू हो गए हैं।

आतंकवादी घटनाएं-

22 अप्रैल: राजौरी जिले में आतंकवादियों ने एक सरकारी कर्मचारी की गोली मारकर हत्या कर दी।

28 अप्रैल: ऊधमपुर के सुदूर गांव में आतंकियों ने गोलीबारी की थी। इस हमले में ग्राम सुरक्षा गार्ड बुरी तरह घायल हो गए थे, जिसमें उनकी मौत हो गई।

4 मई: पुंछ में सुरनकोट के शशिधार क्षेत्र में वायुसेना के वाहनों पर हमला हुआ। इसमें अफसर विक्की पहाड़े वीरगति को प्राप्त हुए थे, जबकि पाँच जवान घायल हो गए थे।

9 जून: रियासी में शिवखोड़ी से श्रद्धालुओं की बस पर आतंकी हमला हुआ। इस हमले में नौ लोगों की मौत हो गई, जबकि 41 लोग घायल हो गए थे।

11 जून: जम्मू संभाग में इस दिन दो आतंकी हमले हुए। कठुआ के हीरानगर और डोडा के चत्तरगाला चेक पॉइंट पर आतंकी हमला हुआ था। हीरानगर में दो आतंकियों को सुरक्षाबलों ने मार गिराया, जबकि चत्तरगाला में एक एसपीओ समेत पाँच जवान घायल हुए।

12 जून: डोडा जिले में आतंकवादी हमले में एक पुलिसकर्मी घायल।

26 जून: डोडा जिले में सुरक्षाबलों ने एक बड़ी कार्रवाई करते हुए तीन विदेशी आतंकियों को मार गिराया।

6 जुलाई: दक्षिणी कश्मीर के कुलगाम में मोदरगाम और चिन्नीगाम में आतंकियों और सुरक्षाबलों की मुठभेड़ हुई। इसमें जवानों ने चार आतंकी मार गिराए। दो जवान भी वीरगति को प्राप्त हुए।

7 जुलाई: राजौरी जिले के गलुथी गांव में तड़के आतंकियों ने सुरक्षा चौकी पर फायरिंग की। इसमें एक सैन्यकर्मी घायल हो गया।

8 जुलाई: जम्मू-कश्मीर के कठुआ में गश्ती दल पर हुए आतंकी हमले में  22वीं गढ़वाल राइफल्स के पाँच जवान वीरगति को प्राप्त हुए। इतने ही जवान घायल हुए थे।

10 जुलाई: राजौरी के नौशेरा सेक्टर 10 में आतंकियों ने घुसपैठ की कोशिश की। लेकिन जवानों ने उनकी इस कोशिश को नाकाम कर दिया।

15 जुलाई: डोडा के धारी गोटे उरारबागी इलाके में सर्च ऑपरेशन के दौरान आतंकवादियों से मुठभेड़ में सेना के कैप्टन समेत चार जवान वीरगति को प्राप्त हुए।

17 जुलाई: डोडा जिले में देर रात आतंकवादियों के साथ हुई मुठभेड़ में सेना के दो जवान घायल हो गए।