Defence Monitor

दक्षिण एशिया के तेजी से बदलते घटनाक्रम में भारत की भूमिका

ऐसे दौर में जब यूरोप और पश्चिम एशिया में युद्ध की स्थिति है, भारत के आसपास के देशों में परिस्थितियाँ हालांकि उतनी चिंतनीय नहीं हैं, पर इलाके में स्थिरता भी नहीं है। सबसे ज्यादा अस्थिरता म्यांमार में है, जिसके रखाइन क्षेत्र पर बागी अराकान आर्मी का कब्जा हो गया है और वहाँ का सैनिक-शासन धीरे-धीरे परास्त होता दिखाई पड़ रहा है।

पिछले साल पाकिस्तान, श्रीलंका, मालदीव और नेपाल में किसी न किसी रूप में सत्ता परिवर्तन हुए हैं और अफगानिस्तान 2021 में हुए सत्ता-परिवर्तन के बावजूद तालिबान सरकार को वैश्विक-मान्यता नहीं मिल पाई है। इस लिहाज से भारत और भूटान दो ऐसे देश हैं, जहाँ राजनीतिक-स्थिरता के दर्शन होते हैं। अलबत्ता भारत और चीन के रिश्तों की छाया अब भूटान पर भी पड़ने लगी है। ऐसे में कई विशेषज्ञ इस बात को रेखांकित करने का प्रयास करते हैं कि भारत का अपने पड़ोसियों पर प्रभाव कम होता जा रहा है। इसके लिए वे दक्षिण एशिया सहयोग संगठन (सार्क) की निष्क्रियता का हवाला देते हैं, पर यह अर्धसत्य है। सार्क की निष्क्रियता के पीछे भारत-पाकिस्तान रिश्तों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है, जिसके विपरीत हमें भारत की वैश्विक-राजनीति में बढ़ती भूमिका की ओर भी देखना चाहिए।

भारत के पड़ोसियों में, भूटान को छोड़कर, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल और हाल ही में बांग्लादेश सहित अन्य देश आंतरिक रूप से पीड़ित हैं, जहां कुछ हद तक राजनीतिक अस्थिरता या उनके पड़ोस के साथ तकरार-टकराव है। दक्षिण पूर्व में म्यांमार की अस्थिरता के मुकाबले थाईलैंड, मलेशिया, कंबोडिया, वियतनाम, इंडोनेशिया, फिलीपींस, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया और जापान के साथ भारत के व्यापारिक और राजनयिक-रिश्तों में काफी सुधार है। इन देशों पर चीन का असर अपेक्षाकृत कम है, जो भारत का मुख्य प्रतिस्पर्धी है। भारत और चीन के रिश्ते करीब चार साल बाद फिर से सामान्य होने की दिशा में बढ़े हैं। कहना मुश्किल है कि वे किस हद तक सुधरेंगे। अलबत्ता हिंद-प्रशांत क्षेत्र में हमारी मुख्य स्पर्धा चीन से है, जो बंगाल की खाड़ी, अरब सागर और समूचे हिंद महासागर में दिखाई पड़ रही है।

भारत-अफगानिस्तान

जनवरी के महीने में भारत ने तालिबान शासित अफगानिस्तान से शुरुआत करते हुए, एक नई दिशा में कदम बढ़ाया है, जिसके व्यापक निहितार्थ जल्द ही देखने को मिलेंगे। एक तरफ भारत-बांग्लादेश के रिश्तों में कड़वाहट आ रही है, वहीं अफगानिस्तान के साथ रिश्तों में अप्रत्याशित सुधार दिखाई पड़ रहा है। गत 8 जनवरी को भारत के विदेश-सचिव विक्रम मिस्री और तालिबान सरकार के विदेशमंत्री आमिर खान मुत्तकी के बीच हुई बैठक से एक साथ कई तरह के संदेश गए हैं।

अब तक संयुक्त सचिव स्तर के एक भारतीय अधिकारी मुत्तकी और रक्षामंत्री मोहम्मद याकूब सहित तालिबान के मंत्रियों से मिलते रहे हैं। लेकिन विदेश सचिव की इस मुलाकात से रिश्तों को एक नया आयाम मिला है। भारत के इस कदम को राष्ट्रीय-सुरक्षा की दृष्टि से उठाया गया कदम माना जा रहा है। इस मुलाकात के पहले भारत ने पाकिस्तानी वायुसेना द्वारा अफगानिस्तान के पक्तिका प्रांत में किए गए हमलों की निंदा करके प्रतीक रूप में संकेत दे दिया था कि वह किसी बड़ी राजनयिक-पहल के लिए तैयार है।

हाल में पाकिस्तानी वायुसेना के हमले में महिलाओं और बच्चों सहित 46 अफगान नागरिकों की जान गई थी। इससे बिगड़ते पाक-अफगान रिश्तों पर रोशनी पड़ी, वहीं भारत के बयान से इसका दूसरा पहलू भी उजागर हुआ। भारत की दिलचस्पी इस बात में रही है कि अफगानिस्तान में आतंकवाद का  पनपना बंद हो जाए। सभी अनुमानों के अनुसार, स्थिति में सुधार हुआ है। यह भी सच है कि वहाँ महिलाओं के अधिकारों को कुचला गया है, जो भारत के लिए परेशानी की बात है।

चीन का बढ़ता प्रभाव

पर्यवेक्षक मानते हैं कि भारत के इस समय बातचीत करने के पीछे कुछ बड़े कारण इस प्रकार हैं: एक, तालिबान का हितैषी और सहयोगी पाकिस्तान उसका विरोधी बन गया है, ईरान काफ़ी कमज़ोर हो गया है, रूस अपनी लड़ाई में फँसा है और अमेरिका ट्रंप की वापसी देख रहा है। इन सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि चीन ने तालिबान के साथ राजदूतों का आदान-प्रदान करके अफ़गानिस्तान में अपनी पैठ बना ली है। भारत मानता है कि चीन की अपनी बेल्ट एंड रोड पहल के तहत अफ़गानिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों पर नज़र है।

काबुल में चीन के सहयोग से घरों और पार्कों के निर्माण के लिए बड़े पैमाने पर शहरी विकास परियोजना चल रही है। घटनाक्रम पर गहराई से नजर रखने वाले भारत का नेतृत्व इस निष्कर्ष पर पहुँच गया कि यह सही समय है कि आधिकारिक मान्यता दिए बिना आधिकारिक संपर्क के स्तर को उन्नत किया जाए। अन्यथा अफगानिस्तान में वर्षों के निवेश से हाथ धोना पड़ेगा।

संपर्क कायम

अगस्त 2021 में जब तालिबान ने काबुल पर कब्ज़ा कर लिया था, तब से पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान और अफगानिस्तान के संयुक्त सचिव जेपी सिंह के बीच कम से कम चार बैठकें हो चुकी हैं। तालिबान ने भारतीय हितों और दूतावास परिसर सहित सुविधाओं के लिए सुरक्षा की गारंटी सुनिश्चित की है।

भारत ने अपना पहला कदम 31 अगस्त, 2021 को ही उठा लिया था, जब कतर में उसके राजदूत दीपक मित्तल ने तालिबान के दोहा कार्यालय के प्रतिनिधियों से मुलाकात की, जिसका नेतृत्व शेर मोहम्मद अब्बास स्तानिकज़ाई कर रहे थे।

उस बैठक में तालिबान अधिकारियों ने साफ कहा था कि पिछले 20 वर्षों में अनुमानित तीन अरब डॉलर की भारत की परियोजनाएं बेहद उत्पादक रही हैं और हम चाहेंगे कि भारत, अफ़गानिस्तान में निवेश करता रहे। दोनों देशों के बीच औपचारिक राजनयिक-रिश्तों की अनुपस्थिति के बावजूद यह संपर्क एक महत्वपूर्ण संकेत है। बैठक के बाद भारतीय वक्तव्य में कहा गया है कि अफगानिस्तान में चल रहे मानवीय सहायता कार्यक्रम के अतिरिक्त, निकट भविष्य में विकास परियोजनाओं में शामिल होने पर भारत विचार करेगा।

भारत का महत्व

मुत्तकी ने प्रमुख आर्थिक देश के रूप में भारत के महत्व को पहचानते हुए उसके साथ राजनीतिक और आर्थिक संबंधों की इच्छा व्यक्त की। साथ ही कहा कि अफगानिस्तान से किसी को कोई खतरा नहीं है। मिस्री ने कहा कि भारत राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्रों में अफगानिस्तान के साथ संबंधों का विस्तार करने और पड़ोसी ईरान में चाबहार बंदरगाह के माध्यम से व्यापार को बढ़ावा देने के लिए तैयार है।

भारत-अफगान रिश्तों की रोशनी के अलावा पाकिस्तान-अफगान रिश्तों की दृष्टि से भी यह महत्वपूर्ण परिघटना है। चूंकि पाकिस्तान की विदेश-नीति के केंद्र में भारत-द्वेष शामिल रहता है, इसलिए वह इसे शत्रुतापूर्ण कार्रवाई मानेगा।

केवल 1996 से 2001 के तालिबान शासन को छोड़ दें, तो अफगानिस्तान के साथ भारत के रिश्ते हमेशा अच्छे रहे हैं। दूसरी तरफ 1947 में भारत के विभाजन के बाद उनके पाकिस्तान के साथ शायद ही कभी अच्छे रिश्ते रहे हों। 1947 में अफगानिस्तान अकेला देश था, जिसने पाकिस्तान को संरा का सदस्य बनाने का विरोध किया था।

अफगानिस्तान ने पाकिस्तान का विरोध उस दौर में इसलिए किया था, क्योंकि वह पश्तूनिस्तान को अपने देश का हिस्सा मानता था। यह राष्ट्रीय-हितों से जुड़ा मामला था। दोनों देशों की सीमा बनाने वाली डूरंड लाइन को वे स्वीकार नहीं करते हैं। उनका जनजातीय समाज भी पाकिस्तान से पूरी तरह मेल नहीं खाता।

पाक-अफगान तनाव

नई दिल्ली के साथ बढ़ती सक्रियता के कारण पाकिस्तान और तालिबान के बीच तनाव बढ़ेगा। पाकिस्तान का आरोप है कि तालिबान, प्रतिबंधित तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) को अपने यहाँ पनाह और समर्थन देता है।

पाकिस्तानी पर्यवेक्षक मानते हैं कि तीन साल पहले जब अफ़गानिस्तान में तालिबान की वापसी हुई थीं, तब हमें लगता था कि इससे देश की पश्चिमी सीमा पर स्थिरता की गारंटी देने में मदद मिलेगी। पूर्वी सीमा पर भारत के साथ खराब संबंधों को देखते हुए यह लंबे समय से एक रणनीतिक मजबूरी रही है।

टीटीपी के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने में तालिबान की अनिच्छा ने इस्लामाबाद की इस उम्मीद को खत्म कर दिया कि पाकिस्तान की सुरक्षा चिंताओं को काबुल पूरा करेगा। वस्तुतः पाकिस्तानी पर्यवेक्षक इस बात को छिपाते हैं कि उनकी अफगान-नीति के केंद्र में ‘भारत-विरोधी नीति’ है, जो किसी भी अफगान-सरकार को समझ में नहीं आती है।

वे यह भी नहीं मानते कि टीटीपी भी पाकिस्तानी जेहादी डीप-स्टेट की देन है।   इस्लामाबाद में हाल ही में एक सेमिनार में, कुछ विशेषज्ञों ने राय व्यक्त की कि काबुल में शासकों के साथ संवाद करने के बजाय, पाकिस्तान को कंधार में तालिबान नेतृत्व के साथ टीटीपी मुद्दे को उठाना चाहिए, जहाँ से अफ़गानिस्तान में वास्तविक शक्ति प्रवाहित होती है।

तालिबान के सर्वोच्च नेता हिबातुल्ला अखुंदज़ादा एकांत-प्रिय व्यक्ति हैं। सवाल है कि पाकिस्तान उन्हें या उनके करीबी लोगों को क्या अपने पक्ष में कर सकता है? पाकिस्तानी शासकों और खासतौर से सेना को यह बात अब भी समझ में नहीं आ रही है कि यह आग उनकी खुद की लगाई हुई है।

भारत-द्वेष की नीति

पाकिस्तान की अफगान-नीति ही नहीं, पूरी विदेश-नीति भारत-द्वेष पर आधारित है। इस बात की वहाँ के बड़े-बड़े विशेषज्ञ भी अनदेखी करते हैं। कश्मीर में जेहाद के नाम पर उन्होंने चरमपंथी तत्वों को बढ़ावा दिया। इस खेल में अब उनके ही हाथ जलने लगे हैं। भारत और अफगानिस्तान के बीच कोई द्विपक्षीय विवाद नहीं है। दूसरी तरफ अफगान-पाकिस्तान के बीच सीमा से जुड़ी समस्याएँ हैं। अफगान लोग लंबे समय से अपने आंतरिक मामलों में पाकिस्तानी सेना के बेशर्मी से दखल से नाराज़ हैं।

पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में कट्टरपंथी इस्लाम को बढ़ावा देने और तालिबान को भारत-विरोधी ताकत के रूप में तैयार करने की कोशिश की है। 1947 और 1989 में पाकिस्तानी सेना ने कश्मीर की घुसपैठ में कबायलियों का इस्तेमाल किया। इस समय भी डर था कि पाकिस्तान वैसी ही कोशिश फिर से करेगा।

वैश्विक मान्यता

ज्यादा बड़ा मसला अफगानिस्तान को वैश्विक-मान्यता से जुड़ा है, जो अमेरिकी सहयोग के बगैर संभव नहीं। दुनिया के किसी भी देश ने औपचारिक रूप से तालिबान-शासन को मान्यता नहीं दी है, लेकिन चीन, रूस, पाकिस्तान, ईरान और कतर सहित कई पड़ोसी और क्षेत्रीय देशों ने अपने दूतावास बना लिए हैं।

भारत ने भी काबुल में अपने राजनयिक मिशन को फिर से खोला है। इसके अलावा तालिबान का एक प्रतिनिधि भारत में तैनात किया गया है। रिश्तों में सुधार के साथ अब भारत सरकार को अफगानिस्तान में चल रहे मानवाधिकार-उल्लंघन से जुड़े मामलों पर भी अपने रुख को साफ करना होगा।

इस मुलाकात के बारे में विदेश मंत्रालय के आधिकारिक बयान में मानवाधिकारों का कोई उल्लेख नहीं है, चाहे वे महिलाओं के अधिकार हों या अल्पसंख्यकों के,। साथ ही अफगानिस्तान में समावेशी सरकार से जुड़ी कोई बात भी उसमें नहीं है।

व्यावहारिक सत्य

हमें व्यावहारिक बातों पर भी विचार करना चाहिए। हम अफ़गानिस्तान की आंतरिक राजनीति को बदल नहीं सकते। इसलिए हमें काबुल की सत्ता में आने वाली किसी भी सरकार के साथ संपर्क बनाकर रखना चाहिए। बेशक तालिबान के दमनकारी शासन पर अपने दृष्टिकोण को भी स्पष्ट करते रहना चाहिए।

भारत को अफगानिस्तान के अंदर सकारात्मक बदलावों को बढ़ावा देने के लिए संयुक्त अरब अमीरात और अन्य उदार अरब राज्यों के साथ काम करना चाहिए। दूसरे तालिबान के सत्ता में आने के बावजूद भारत को अफगानिस्तान में अपने पुराने मित्रों को भूलना नहीं चाहिए।

भारत ने कई अफगान नागरिकों को वीज़ा देने इनकार कर दिया, जो अनुचित है। काबुल में इस समय भी भारत और तालिबान के बीच संपर्क सेतु के रूप में पूर्व राष्ट्रपति हामिद करज़ाई रह रहे हैं, उनकी मदद भी लेनी चाहिए।

सहायता कार्यक्रम

अफगानिस्तान में तालिबान का शासन आने के बाद से भारत ने 50,000 मीट्रिक टन गेहूँ, 300 टन दवाइयाँ, 27 टन भूकंप राहत सहायता, 40,000 लीटर कीटनाशक, 10 करोड़ पोलियो खुराक, 1।5 लाख कोविड वैक्सीन, नशा मुक्ति कार्यक्रम के लिए 11,000 यूनिट स्वच्छता किट, 500 यूनिट सर्दियों के कपड़े और 1।2 टन स्टेशनरी किट सहित कई खेप भेजी हैं।

दोनों देशों के बीच रिश्तों में क्रिकेट के खेल ने भी बड़ी भूमिका निभाई है। अफगानिस्तान की क्रिकेट टीम ने अपने देश के लिए डिप्लोमेसी का काम किया है। इसमें भारतीय सहयोग की बड़ी भूमिका है, क्योंकि भारत ने अफगान क्रिकेटरों को ग्रेटर नोएडा में ट्रेनिंग के लिए विशेष सुविधाएँ उपलब्ध कराई थीं।

पर्यवेक्षक मानते हैं कि भारत-अफगानिस्तान रिश्तों का कायम करने में अमेरिकी मदद की जरूरत भी होगी। मदद मिली भी है। चाबहार बंदरगाह के संचालन में अमेरिकी प्रतिबंधों से मिली राहत की भूमिका है। फिर भी देखना होगा कि अब जब अमेरिका में जब डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति पद पर आ चुके हैं, तब अमेरिका की नीति किस दिशा में जाएगी।

बांग्लादेश में बदलाव

अफगानिस्तान में जहाँ भारतीय डिप्लोमेसी ने सक्रियता दिखाई है, वहीं पिछले साल 5 अगस्त में शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद से भारत-बांग्लादेश रिश्तों में गिरावट आई है। भारत समर्थक प्रधानमंत्री शेख हसीना और उनकी अवामी लीग सरकार को उनकी सेना ने, जाहिरा तौर पर छात्रों के आंदोलन के दबाव में, बेदखल कर दिया। उनके ढाका से निष्कासन के कुछ घंटों के भीतर,  अर्थशास्त्री मुहम्मद यूनुस आश्चर्यजनक तरीके से बांग्लादेश पहुँच गए और उन्होंने अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार के रूप में कार्यभार संभाला और अब वस्तुतः देश पर शासन कर रहे हैं।

देश में अल्पसंख्यकों, विशेषतः हिंदुओं के खिलाफ बड़े पैमाने पर अकारण हिंसा चल रही है, जिसे ढाका स्वीकार नहीं करता। कुछ तल्ख बयानों को छोड़कर भारत ने बांग्लादेश के प्रति काफी नरम रवैया बनाकर रखा है। विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने 9 दिसंबर को बांग्लादेश की यात्रा करके नए दौर की बातचीत के पहले चरण की शुरुआत कर दी है, पर भारत उन भावनात्मक प्रश्नों की अनदेखी नहीं कर सकेगा, जो विभाजन के बाद से दक्षिण एशिया की राजनीति और समाज को प्रभावित कर रहे हैं।

ऐसे समय में जब नेपाल, श्रीलंका और मालदीव में सरकारों के बदलाव ने भारत के लिए चुनौतियां खड़ी की हैं, बांग्लादेश का हिंसक बदलाव भारत के लिए बड़ा धक्का है। हमारी डिप्लोमेसी को इस मौके पर अपनी परिपक्वता दिखानी होगी।   अलबत्ता अब हमें बांग्लादेश की नई राजनीतिक-संविधानिक व्यवस्था के पाकिस्तान-झुकाव का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा। वहाँ की अंतरिम सरकार ने पाकिस्तान के साथ रिश्तों को जोड़ना शुरू कर दिया है, जिसमें कारोबार के अलावा सैनिक-गतिविधियाँ भी शामिल हैं। यह भी साफ होता जा रहा है कि शेख हसीना के तख्ता-पलट के पीछे सामान्य छात्र-आंदोलन नहीं था, बल्कि कोई बड़ी योजना थी।

अंततः अंतरिम सरकार ने शेख हसीना के प्रत्यर्पण का औपचारिक अनुरोध भारत से कर दिया। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने इस मौखिक-अनुरोध की पुष्टि की है, साथ ही यह भी कहा है कि उचित समय पर इसका जवाब बांग्लादेश को दे दिया जाएगा।

भारत-बांग्लादेश प्रत्यर्पण संधि में कई धाराओं के आधार पर भारत, प्रत्यर्पण से इनकार कर सकता है। पर भारत ने अपनी प्रतिक्रिया को फौरन व्यक्त नहीं की है। बांग्लादेश सरकार भी जानती है कि प्रत्यर्पण नहीं होगा। इस समय अनुरोध के पीछे उनके आंतरिक-राजनीतिक कारण हैं।

देश में नई व्यवस्था बनने के पहले शेख हसीना और भारत के खिलाफ जनमत बनाने की यह कोशिश है। इस बीच, भीड़ ने देश के एक प्रमुख समाचार चैनल के पाँच वरिष्ठ पत्रकारों को पद छोड़ने पर मजबूर कर दिया। भीड़ का नेतृत्व छात्र-समन्वयक हसनत अब्दुल्ला कर रहे थे।

अस्पष्ट राजनीति

बांग्लादेश के विद्रोही-संगठनों की वैचारिक दिशा भी अभी स्पष्ट नहीं है। छात्र संगठनों ने गत 31 दिसंबर को अपनी क्रांति की घोषणा का दिन तय किया था, पर वह घोषणा नहीं हुई। आंदोलन के नेताओं ने इसके पहले रविवार 29 दिसंबर को ढाका में एक  संवाददाता सम्मेलन में कहा कि 31 दिसंबर को देश में मुजीबिस्ट संविधान को दफ़न कर दिया जाएगा और एक पार्टी के रूप में अवामी लीग बांग्लादेश में अप्रासंगिक हो जाएगी। हम शहीद मीनार से अपनी ‘जुलाई क्रांति की उद्घोषणा’ करेंगे। सोशल मीडिया पर लिखा जा रहा था, ‘थर्टी फर्स्ट दिसंबर, अभी या कभी नहीं।’ उनका कहना है, 5 अगस्त के बाद क्रांतिकारी सरकार बनी होती तो देश में संकट पैदा नहीं होते। पता नहीं कि ‘क्रांतिकारी सरकार’ से उनका आशय क्या है और अंतरिम सरकार से उन्हें क्या कोई शिकायत है।

अंतरिम सरकार में सलाहकार महफूज आलम ने हाल में फेसबुक पर एक पोस्‍ट डालकर भारत के कई इलाकों पर कब्जा करने की धमकी दी है। यूनुस प्रशासन ने नवंबर में सलाहकार परिषद का और विस्तार करके महफूज आलम सहित कुछ और लोगों को शामिल किया था। पोस्ट शेयर करने के कुछ समय महफूज आलम ने अपनी पोस्ट हटा ली, पर भारत सरकार ने इसके आधार पर बांग्लादेश को चेतावनी दी है। प्रत्यर्पण की माँग, शेख मुजीब की विरासत और अवामी लीग को बदनाम के लिए भी की जा रही है। बंगबंधु-परिवार के साथ भारत पर कीचड़ उछालने की यह कोशिश है।

डॉ यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम शासन को मतदाताओं की स्वीकृति प्राप्त नहीं है। इस बात को समझते हुए राष्ट्रीय एकता, चुनाव और सुधार के मुद्दों पर एक राष्ट्रीय संवाद शुरू किया गया है। फोरम फॉर बांग्लादेश नामक एक गैर-सरकारी संगठन ने ‘ऐक्य कोन पथे’ शीर्षक से 27 और 28 दिसंबर को इस संवाद का आयोजन किया। इस दो दिवसीय वार्ता के पहले दिन मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस ने कहा कि सुधार के बिना चुनाव बांग्लादेश को आगे नहीं बढ़ा सकते। उन्होंने यह भी कहा कि मतदान की आयु 17 वर्ष होनी चाहिए। वे यह भी चाहते हैं कि संसद सदस्यता के लिए न्यूनतम आयु 25 से कम करके 21 कर दी जाए। वे उन युवाओं के दबाव में हैं, जो शेख हसीना के खिलाफ आंदोलन में सबसे आगे थे।

इसके पहले 16 दिसंबर को ‘विजय-दिवस’ पर राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में  मुहम्मद यूनुस ने कहा, चुनाव 2025 के अंत और 2026 की पहली छमाही के बीच हो सकते हैं। उसके अगले दिन, उनके प्रेस सचिव शफ़ीकुल आलम ने विदेश सेवा अकादमी में कहा, सुधारों पर निर्भर करेगा कि चुनाव कब होंगे। आप 30 जून, 2026 तक उम्मीद कर सकते हैं। प्रमुख राजनीतिक दलों में से केवल बीएनपी ही जल्द चुनाव कराने की माँग कर रही है। अवामी लीग की आवाज़ न तो सुनाई पड़ रही है और कोई आवाज़ है भी तो उसे सुना नहीं जा रहा है।

पाकिस्तान से रिश्ते

गत 8 अगस्त को अंतरिम सरकार का प्रमुख बनने के तुरंत बाद, डॉ यूनुस ने  पाकिस्तान से दूरी रखने की नीति को त्याग दिया। गत 19 दिसंबर को काहिरा में आयोजित डी-8 शिखर सम्मेलन के दौरान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से उनकी मुलाकात महत्वपूर्ण है। दोनों नेताओं ने व्यापार, संस्कृति और खेल के क्षेत्र में आदान-प्रदान के ज़रिए संबंधों को फिर से मजबूत करने पर सहमति जताई। यूनुस ने 1971 के लंबित मामलों को सुलझाने की बात तो कही, पर पाकिस्तान से माफी माँगने को नहीं कहा, जो अबतक बांग्लादेश की ओर से अनिवार्य शर्त होती थी।

इस्लामाबाद और ढाका के बीच सीधी उड़ानें पाँच साल के अंतराल के बाद फिर से शुरू हो गई हैं। पाकिस्तानी नागरिकों के लिए वीज़ा शर्तों ढील दे दी गई है। जनवरी में होने वाली एक व्यापार प्रदर्शनी में भाग लेने के लिए पाकिस्तान को आमंत्रित भी किया गया है। पाकिस्तान से आने वाले मालवाहक जहाज अब बिना माल की जाँच किए सीधे चटोग्राम बंदरगाह पर उतरेंगे। कारोबारियों को जबरन पाकिस्तान के साथ कारोबार करने और वहाँ से सामान ख़रीदने का दबाव बनाया जा रहा है। कुछ अधिकारी भारत-बांग्लादेश शिपिंग समझौते की समीक्षा करने का सुझाव भी दे रहे हैं। इस समझौते के तहत ही भारत को चटोग्राम और मोंगला बंदरगाहों तक जाने की इजाजत है।

पाकिस्तानी सेना के जॉइंट चीफ ऑफ स्टाफ कमेटी के चेयरमैन जनरल साहिर शमशाद मिर्जा के नेतृत्व में एक टीम फरवरी 2025 में बांग्लादेश आ रही है। यह 53 वर्षों में किसी वरिष्ठ पाकिस्तानी सैन्य अधिकारी की बांग्लादेश की पहली यात्रा होगी। उसी दौरान पाकिस्तान के कराची पोर्ट पर बांग्लादेश की नौसेना पाकिस्तान के बहुराष्ट्रीय संयुक्त अभ्यास ‘अमन’ में भाग भी लेगी। अंतरिम सरकार ने न केवल इस अभ्यास में भाग लेने की मंजूरी दी है, बल्कि बंगाल की खाड़ी में पाकिस्तानी नौसेना के साथ साझा युद्धाभ्यास की तैयारी भी शुरू कर दी है।

मालदीव, श्रीलंका और नेपाल

उपरोक्त तीनों देशों में भारत को चीनी-गतिविधियों का सामना करना पड़ रहा है। हाल में श्रीलंका में राजनीतिक बदलाव हुआ है, जिसके बाद श्रीलंका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति अनुरा दिसानायके ने नई दिल्ली की अपनी पहली यात्रा पर भारत को आश्वासन दिया कि उनका देश किसी को भी भारत विरोधी एजेंडे के लिए अपने क्षेत्र का उपयोग करने की अनुमति नहीं देगा, जो स्वागत योग्य है। नए राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके, मार्क्सवादी विचारधारा वाली जनता विमुक्ति पेरामुना के नेता हैं, जो सिंहली राष्ट्रवाद और भारत-विरोधी रुख के लिए जाने जाते हैं। हाल में श्रीलंका के आर्थिक-संकट में फँसने के बाद भारत ने उसे अंतरराष्ट्रीय सहायता प्राप्त करने में मदद की थी।

हाल में भारत और मालदीव के रिश्तों में भी बदलाव आया है। 2023 में द्विपक्षीय संबंधों में खटास तब आई जब राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज़्ज़ू ने ‘इंडिया आउट’ अभियान के दम पर चुनाव जीता। शपथ लेने के तुरंत बाद, उन्होंने कहा कि भारत द्वीपसमूह से अपने सैन्य कर्मियों को वापस बुलाए। उनके पद-ग्रहण के बाद पहले कुछ महीनों में तल्खी रही।

भारत सरकार ने इन बातों का तल्ख जवाब देने के बजाय, आर्थिक-संकट में घिरी मालदीव सरकार की मौके पर सहायता की। अक्तूबर में मुइज़्ज़ू भारत आए थे। तब से रिश्तों में सुधार होता चला गया। गत 8 जनवरी को मालदीव के रक्षामंत्री मोहम्मद ग़ासन मौमून भारत की यात्रा पर आए। इस मौके पर भारत के रक्षा मंत्रालय ने कहा कि भारत ने मालदीव सरकार के अनुरोध पर उन्हें रक्षा उपकरण और भंडार सौंपे हैं। इस दौरान मौमून ने मालदीव के लिए ‘प्रथम प्रतिक्रियादाता’ के रूप में भारत की ऐतिहासिक भूमिका की सराहना की।

भारतीय सेना में नेपाल से भी काफी सैनिक आते हैं, पर अग्निवीर योजना का नेपाल में इस तरह से प्रचार किया गया है कि नेपाल में सैनिक भरती रुकी हुई है। इतना ही नहीं, कहा जा रहा है कि चीन की दिलचस्पी नेपाल में सैनिक-भरती करने की है। नेपाल में आए दिन राजनीतिक बदलाव होते रहते हैं, इस वजह से वहाँ के राजनीतिक-दृष्टिकोण में स्थिरता नहीं है।