Defence Monitor

हिंद महासागर में चीन की बढ़ती गतिविधियाँ और भारत की सुरक्षा

हिंद महासागर में सबसे लंबी तटरेखा भारत की ही है। ऐसे में भारत के लिए ज़रूरी है कि वह समुद्री-सुरक्षा की चुनौतियों का सामना करे। ज्यादातर समुद्री ख़तरों का सामना करने के लिए दूसरे देशों की मदद की ज़रूरत भी होती है या जरूरत पड़ने पर दूसरों की मदद करनी होती है। ऐसे में भारत को तटीय देशों और प्रमुख वैश्विक शक्तियों के साथ सहयोग बनाकर चलना होगा। देश के पूर्वी तट पर बंगाल की खाड़ी और पश्चिमी तट पर अरब सागर की अलग-अलग चुनौतियाँ हैं। बंगाल की खाड़ी में म्यांमार के कोको द्वीप में चीनी निर्माण की खबरें हैं। वहीं मालदीव में चीन ने अपनी पैठ बना ली है। इसके अलावा जिबूती में उसने अपना सैनिक अड्डा स्थापित कर लिया है और पाकिस्तान के ग्वादर में भी सैनिक अड्डा बनाने की खबरें है। इन दोनों क्षेत्रों के अलावा हिंद महासागर के विस्तृत दक्षिणी क्षेत्र की सुरक्षा भी भारतीय हितों से जुड़ी है। इन तीनों जगहों पर भारत के मुख्य प्रतिस्पर्धी के रूप में चीन उभरा है।

हाल में घटित कुछ घटनाओं पर नज़र डालें. खासतौर से चीन के इशारे पर मालदीव जैसे छोटे देश के नए राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज़्ज़ू के कड़वे बयानों और चीन के समुद्री अनुसंधान पोत जियांग यांग होंग-3 के दो महीने में दो बार मालदीव आगमन पर ध्यान दें। ऐसे पोत इसके पहले म्यांमार और श्रीलंका में भी चक्कर लगाते रहे हैं। एक तरफ पश्चिम एशिया में इसराइल और हमास का टकराव चल रहा है, वहीं अदन की खाड़ी और फारस की खाड़ी से लेकर उत्तरी अरब सागर में चीन और पाकिस्तान की नौसेनाओं की गतिविधियाँ भी बढ़ रही हैं।

बंगाल की खाड़ी

हिंद-प्रशांत की भू-सामरिक सरंचना के लिए बंगाल की खाड़ी काफी महत्वपूर्ण क्षेत्र है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र की अवधारणा हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के विस्तार और संगम की प्रतीक है। यह क्षेत्र अफ्रीका के पूर्वी तट से लेकर अमेरिका के पश्चिमी तट तक फैला है। बंगाल की खाड़ी और इससे लगा अंडमान सागर इस भू-राजनीतिक क्षेत्र का केंद्र हैं, जो प्रशांत महासागर में विलय से पहले हिंद महासागर की पूर्वोत्तरी शाखा की संरचना है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र के समग्र विकास के लिए ज़रूरी है कि इससे लगे सभी क्षेत्रों  का भी विकास हो। भौगोलिक रूप से बंगाल की खाड़ी दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया के बीच पुल का काम करती है।

इस क्षेत्र के भारत, बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका और थाईलैंड जैसे देशों में पिछले एक दशक में तेज़ी से आर्थिक विकास हुआ है। दक्षिण एशियाई देशों ने पिछले दशक में सालाना 7.3 प्रतिशत की औसत विकास दर हासिल की, जो दुनिया में सबसे ज़्यादा है। पश्चिमी एशिया से दक्षिण और दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों के लिए पेट्रोलियम उत्पाद लेकर टैंकर जाते हैं। यह रूट मलक्का जलसंधि से होकर जाता है। इस लिहाज से बंगाल की खाड़ी सामरिक रूप से इस रास्ते के ठीक बीच में पड़ती है।

इस क्षेत्र में दुनिया के करीब 40 प्रतिशत हाइड्रोकार्बन का भंडार है। इसमें 324 अरब टन कोयला, 66.4 करोड़ टन तेल, 9900 अरब घन फुट प्राकृतिक गैस, 11 अरब टन बायोमास शामिल है। यहां 328 गीगावॉट हाइड्रोपावर और 1000 गीगावॉट अक्षय  ऊर्जा (रिन्यूएबल एनर्जी) की संभावित क्षमता भी है। इस हाइड्रोकार्बन में भारत की भी अच्छी-खासी हिस्सेदारी है। सबसे ताज़ा खोज इस साल जनवरी में ही हुई है। महानदी के बेसिन में प्राकृतिक गैस के दो महत्वपूर्ण भंडार पाए गए हैं। भारत काफी समय से कोयले पर निर्भरता कम करके प्राकृतिक गैस की तरफ जाने की कोशिश कर रहा है। इसके लिए ज़्यादा जोखिम वाले गहरे पानी में उत्खनन की जरूरत भी हो सकती है।

इस खाड़ी में समुद्री जीवों की तादाद भी बहुत ज़्यादा है। हर साल यहाँ से 60 लाख  टन मछलियां पकड़ी जाती है। दुनियाभर में मछली पकड़ने में इस क्षेत्र की हिस्सेदारी 4 प्रतिशत की है। मत्स्य उद्योग इस क्षेत्र में भोजन और रोज़गार का बड़ा ज़रिया है. करीब 40 करोड़ लोगों को इससे भोजन मिलता है. इस काम में मछली पकड़ने वाली चार लाख 60 हजार नावों का इस्तेमाल हो रहा है। करीब 45 लाख लोगों को इससे रोज़गार मिला है। ऐसे में ये कहा जा सकता है कि बंगाल की खाड़ी इसके आसपास बसे देशों की ‘ब्लू इकोनॉमी’ (महासागर और समुद्र से जुड़ी आर्थिक गतिविधियों) का अहम हिस्सा है, लेकिन बुनियादी ढाँचे और इन देशों के बीच आपसी सहयोग की कमी से इसकी क्षमता का पूरा इस्तेमाल नहीं हो सका है।

एक्ट ईस्ट

मात्रा के हिसाब से 95 प्रतिशत और लागत के हिसाब से भारत का 77 प्रतिशत अंतरराष्ट्रीय व्यापार समुद्र के रास्ते होता है। हिंद-प्रशांत से जुड़े दृष्टिकोण के तहत आसियान देशों पर ध्यान देने की वजह से ही भारत ने ‘एक्ट ईस्ट’ नीति अपनाई है। भारत जलमार्ग और थलमार्ग से पूर्वी और दक्षिण पूर्वी एशिया के देशों के साथ जुड़ना चाहता है। भारत ने ‘सिक्योरिटी एंड ग्रोथ फॉर ऑल इन द रीजन’ (सागर) के ज़रिए अपने इस दृष्टिकोण को आगे बढ़ाया है।

चीन अपनी विशाल अर्थव्यवस्था और आबादी की ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करने के लिए इस क्षेत्र में रुचि रखता है, पर वह ‘मलक्का दुविधा’ का सामना कर रहा है। मलक्का दुविधा शब्द का सबसे पहले इस्तेमाल चीन के राष्ट्रपति हू जिंताओं ने 2013 में किया था। चीन को इस बात का डर है कि यदि मलक्का जलसंधि की नाकेबंदी कर दी गई, तो फिर इससे उसकी तेल की आपूर्ति पर असर पड़ेगा। इसलिए चीन चाहता है कि बंगाल की खाड़ी क्षेत्र में उसका प्रभाव बढ़े जिससे उसके तेल की बेरोकटोक आपूर्ति जारी रहे।

अपनी मौजूदगी वह इसलिए भी बनाए रखना चाहता है कि इससे म्यांमार के क्यॉकप्यू बंदरगाह से चीन के कुनमिंग इलाके तक जाने वाली तेल और गैस की पाइपलाइन पर कोई ख़तरा ना पैदा हो। इस पाइपलाइन की वजह से अफ्रीका या पश्चिमी एशिया से चीन को होने वाली तेल की आपूर्ति में लगने वाले समय में 700 मील (30 प्रतिशत) की कमी आई है। दूसरे यदि चीन बंगाल की खाड़ी के तटीय देशों में निवेश करके उन्हें आर्थिक रूप से अपने ऊपर निर्भर बनाएगा, तो इन देशों में पाए जाने वाले हाइड्रोकार्बन के भंडार का फायदा चीन को भी मिलेगा।

अमेरिका भी ऊर्जा ज़रूरतों के लिए इस तरफ आकर्षित हुआ है। दूसरे उसे इस क्षेत्र में चीन के बढ़ते असर को लेकर भी चिंता है। जापान के लिए भी बंगाल की खाड़ी महत्वपूर्ण है, क्योंकि पश्चिमी एशिया से जापान जो तेल आयात करता है, उसका 80 प्रतिशत हिस्सा इसी समुद्री रास्ते से होकर गुज़रता है। चीन का बढ़ता असर भारत के प्रभाव को कम कर रहा है। भारत की सुरक्षा चिंताओं से अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया भी सहमत हैं। चीन, आक्रामक नीति वाला देश है। उसने दक्षिण चीन सागर में अपने दावे के लिए कई बार अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन किया है। अपनी स्थिति को मज़बूत करने के लिए चीन कई बार ‘कानूनी वैधता’ का मुखौटा ओढ़ने की कोशिश भी करता है।

अंडमान-निकोबार द्वीप बंगाल की खाड़ी और अंडमान सागर को अलग करता है. पूर्वी और पश्चिमी समुद्री रास्ते से इसकी नजदीकी और मलक्का जलसंधि के बाद पहला भूभाग होने की वजह से अंडमान और निकोबार को सामरिक तौर पर दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण द्वीप श्रृंखला माना जाता है। इसी द्वीप पर भारत की सुदूर पूर्वी कमांड और तीनों सेनाओं की इकलौती एकीकृत कमांड स्थित है। अंडमान और निकोबार कमांड के पास ही इस शिपिंग रूट और मलक्का जलसंधि तक निगरानी की ज़िम्मेदारी है। हाल के वर्षों में भारत ने इस द्वीप की पूरी क्षमता का दोहन करते हुए बंगाल की खाड़ी में अपने हितों को साधने और उनके संरक्षण की कोशिश की है. 2019 में भारत ने अंडमान-निकोबार में नेवी और एयरफोर्स के बुनियादी ढांचे के विकास के लिए 68.2 करोड़ डॉलर आवंटित किए। मई 2020 में लद्दाख में चीन के साथ टकराव के बाद भारत ने इस द्वीप में अतिरिक्त सैनिक, युद्धपोत, विमान और मिसाइल बैटरी तैनात की है।

पड़ोसी देशों से संपर्क

कुछ पर्यवेक्षक मानते हैं कि अंडमान-निकोबार द्वीप पर भारी संख्या में सैनिकों की तैनाती से इस क्षेत्र के कुछ देश नाराज़ हो सकते हैं। इसी वजह से भारत ने पूर्वी पड़ोसी देशों और बड़ी शक्तियों को इस द्वीप के विकास में शामिल करने का प्रयास किया है। भारत और इंडोनेशिया इस बात का आकलन कर रहे हैं कि पोर्ट ब्लेयर एयरपोर्ट और इंडोनेशिया के सबांग एयरपोर्ट के बीच कनेक्टिविटी कैसे बढ़ाई जाए।  अपनी प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के लिए भारत पानी के अंदर निगरानी को बढ़ा रहा है। इसके लिए और ज़्यादा पनडुब्बियों और पनडुब्बी रोधी युद्धक जहाजों की तैनाती की जा रही है।

हाल में भारत ने म्यांमार के कोको द्वीप में चल रही कुछ गतिविधियों को लेकर आपत्ति व्यक्त की थी। बताया जाता है कि चीनी सेना इस द्वीप में संचार से जुड़े कुछ निर्माण कार्य कर रही है, ताकि भारतीय नौसेना की गतिविधियों पर नजर रखी जा सके। ये द्वीप अंडमान निकोबार द्वीप समूह के उत्तर में 55 किलोमीटर की दूरी पर हैं। हाल में इंटेल लैब के रिसर्चर डेमियन सायमन और चैटम हाउस के जॉन पोलॉक ने सैटेलाइट फोटो के आधार पर बताया था कि कोको द्वीप से विमानों की उड़ान और सर्विलांस ऑपरेशंस से जुड़े निर्माण चल रहे हैं। इनमें दो नए हैंगर, 230 मीटर लंबा रनवे, रेडार स्टेशन और एक पक्की सड़क शामिल है।

अरब सागर

दक्षिण चीन सागर के सैन्यीकरण और अमेरिका तथा भारत जैसी ‘बाहरी-ताकतों’ को वहाँ जगह देने से इनकार करने के बाद, चीन ने हिंद महासागर की ओर आक्रामक रुख अपनाया है। उसके युद्धपोतों ने चीनी-पट्टे वाले हंबनटोटा और श्रीलंका के कोलंबो बंदरगाहों में लंगर डाले हैं। भारत की आपत्तियों के बावजूद 2022 और 2023 में श्रीलंका में और हाल में मालदीव में, उसके समुद्री निगरानी करने, समुद्र-तल संसाधनों का अध्ययन करने वाले पोत और पनडुब्बियों का आवागमन बढ़ा है। हंबनटोटा बंदरगाह का इस्तेमाल चीन अपने युद्धपोतों के लिए ईंधन भरने वाले स्टेशन के रूप में भी करना चाहता है।

2009 के बाद से चीन ने हिंद महासागर में अपने व्यापारिक पोतों के लिए समुद्री मार्गों को न केवल सुरक्षित करने, बल्कि इस क्षेत्र पर अपने वर्चस्व को स्थापित करने के प्रयास शुरू कर दिए हैं। उसने हिंद और प्रशांत महासागरों के लिए ‘दो-महासागरीय रणनीति’ तैयार की है, जिसके लिए वह अपने तेल आयात का हवाला देता है। वस्तुतः उसका असली उद्देश्य हिंद महासागर में डिएगो गार्सिया के अमेरिकी बेस और भारतीय नौसेना की बढ़ती ताकत का जवाब देना है। इस काम के लिए उसने म्यांमार, बांग्लादेश, श्रीलंका, मालदीव और पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति का सहारा लिया है।

दक्षिण एशिया में पाकिस्तान उसका सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी है और अब मालदीव उसका दूसरे नंबर के मित्र के रूप में उभर रहा है। मार्च 2024 में जिस समय मालदीव से भारतीय सैन्य कर्मियों को हटाने पर बातचीत चल रही थी, उसी समय मालदीव ने चीन के साथ एक रक्षा सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते का ब्यौरा सार्वजनिक नहीं किया गया है, पर कहा जा रहा है कि जनवरी में मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज़्ज़ू की चीन यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच संबंधों को ‘व्यापक सामरिक और सहकारी साझेदारी’ के स्तर पर बढ़ाने को लेकर किए गए फैसले के मुताबिक है। इस समझौते का लब्बो-लुबाव यह था कि मालदीव को चीन मुफ्त में सैन्य सहायता मुहैया कराएगा।

अमेरिका और भारत-दोनों चीन की पनडुब्बियों, युद्धपोतों और अनुसंधान (या जासूसी) पोतों की चाल पर क़रीब से निगरानी रखते हैं। जिबूती में वह एक अड्डा स्थापित कर चुका है। किसी भी स्थिति के लिए भारत लक्षद्वीप में अपनी सैन्य मौजूदगी को बढ़ा रहा है। भारत ने मिनिकॉय द्वीप में एक नए नौसैनिक अड्डे आईएनएस जटायु की स्थापना की है जो लक्षद्वीप के ही कवरत्ती में नौसेना के अड्डे आईएनएस द्वीप-रक्षक के अलावा है। आईएनएस जटायु मालदीव के सबसे नज़दीक भारतीय सैन्य अड्डा है।

पिछले कुछ वर्षों में चीन ने पाकिस्तानी नौसेना को खासतौर से उपकरणों और प्लेटफॉर्मों से सजाया है। पाकिस्तानी नौसेना के आधुनिकीकरण में तुर्की की भूमिका भी है, पर सबसे बड़ा हाथ चीन का है। मालदीव इन दो देशों की ओर ही हाथ बढ़ा रहा है। नवंबर के दूसरे सप्ताह में चीन और पाकिस्तान की नौसेनाओं ने अब तक का अपना सबसे बड़ा सी गार्डियन-3 नौसैनिक-अभ्यास किया। दोनों नौसेनाओं के अभ्यास सी गार्डियन-2023 का उद्घाटन 11 नवंबर को कराची स्थित पाकिस्तान नौसेना के डॉकयार्ड में किया गया। यह अभ्यास 17 नवंबर तक चला। चीन के किंगदाओ नौसेना बेस के कमांडर, रियर एडमिरल लियांग यांग और पाकिस्तान फ्लीट के कमांडर वाइस एडमिरल मुहम्मद फैसल अब्बासी इस मौके पर पहुंचे थे। दोनों ने इस साझा अभ्यास को नौसेनाओं के बीच गहरे सामरिक-संबंधों का प्रतीक बताया।