Defence Monitor

चीन का विघटनकारी उदय

वृहद् इतिहास

चीन का पूर्व से पश्चिम तक लगभग 5,200 कि0मी0 और उत्तर से दक्षिण तक 5,500 कि0मी0 का भू-भाग है। यह 14 देशों के साथ अपनी भू-सीमा साझा करता है, वहीं पूर्व में यह पीले सागर के पार दक्षिण कोरिया और जापान का सामना करता है। चीन के साथ कई अन्य आकर्षक आंकड़े जुड़े हुए हैं; जैसे इसका आकार, जनसंख्या, प्राकृतिक संसाधन, पर्वत श्रृंखला और वृहद् समुद्र तट। चीन 4,000 साल से अधिक पुरानी सभ्यता है। इतिहास हमें बताता है कि यह 20वीं शताब्दी की शुरुआत में ज़िया, किन, हान और किंग तक कई राजवंशों द्वारा  शासित था। इन राजवंशों के दौरान चीन को कई बार विघटन और पुनर्घटन  से गुजरना पड़ा। कई बाहरी प्रभावों के बावजूद चीन काफी हद तक एक अंतर्मुखी और सजातीय समाज बना रहा। चीन गणराज्य 1912 में राजवंशीय नियमों के सदियों के समापन के बाद  उभरा हालांकि, यह अवधि बेहद अस्थिर साबित हुई। वर्तमान जापान अपने स्वयं के विंटेज स्वरुप के बिल्कुल विपरीत है। पुराने जापान ने कब्जे के दौरान बर्बरता और लूट के साथ चीन को गहराई से प्रभावित किया। चीनियों ने अंततः 1949 में उन्हें मुख्य भूमि (ताइवान भू भाग को छोड़ कर) से उखाड़ फेंका और इसके साथ मुख्य भूमि में पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना उभरा, जबकि वर्तमान ताइवान चीन गणराज्य के रूप में बना रहा। पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना ने साम्राज्यवाद से लड़ने और पूंजीवादी आक्रमणकारियों से मुकाबले के लिए राष्ट्र को एक साथ संगठित किया। यह कम्युनिस्ट पार्टी थी जिसने अतीत से सबक लिया और 1980 के दशक के अंत में आर्थिक सुधारों को अपनाया। चीन 2001 में डब्ल्यू0टी0ओ में नवीनतम प्रवेशकर्ताओं में से एक था। निःसंदेह वर्तमान चीन के पास कई महत्वपूर्ण विरासत है जिनमे, कम्युनिस्ट सेटअप, वन पार्टी सिस्टम और ताइवान के साथ टकराव है।

चीन कागज, छपाई, गन पाउडर और कम्पास का आविष्कार करने का श्रेय खुद को देता है। इसने 1978 में एकमात्र महिला अध्यक्ष सोंग किंगलिंग के तहत ठोस सुधार किए। यह एक गरीब राष्ट्र के लिए संघर्ष पूर्ण तथ्य था, जहां लाखों लोग भूखे रह रहे हों वह खुद को आधुनिक बनाने की इच्छा रखता हो। वास्तव में पूंजीवादी पश्चिमी देशों ने इस कम्युनिस्ट राष्ट्र की सफलता की संभावना पर सवालिया निशान लगा दिया था। दमनकारी नीतियां, प्रतिबंधात्मक स्वतंत्रता, मानवाधिकारों का हनन, जो चीन ने विकास हासिल करने के लिए अपनाया था, वह सब उल्टा पड़ सकता था; सरल शब्दों में कहें तो चीन अंदर ही अंदर बिखर सकता था। यह इतना जोखिम भरा रास्ता था कि दुनिया जानती थी कि यह अनुकरण करने लायक नहीं है। चीन ने आश्चर्यजनक सफलता हासिल करने के लिए एक बेहद जोखिम भरा दांव लगाया जो उसके पूरी तरह से पत्तन का कारण भी बन सकता था। इसने संसाधनों से परे महत्वाकांक्षाओं का पीछा किया। यह तथ्य काफी हद तक बताता है कि पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना इस तरह से व्यवहार क्यों करता है। जैसे-जैसे सुधारों ने गति पकड़ी, विकास दिखाई देने लगा। मानव मनोविज्ञान को समझें तो, अमीर हो या गरीब हर कोई जीवन में सफल होना चाहता है। इसी स्वर्णिम भविष्य का यकीन चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सी0सी0पी) ने अपने लोगों को दिया। लेकिन उल्लेखनीय यह था कि सी0सी0पी ने ऐसा करने में सफलता भी हासिल की। इसे चीन के पी-5 और परमाणु ताकत के हैसियत के साथ जोड़ा जाए तो यह उसकी लगभग अभूतपूर्व उपलब्धियों को प्रतिबिंबित करता है।

 

अपरंपरागत उदय

चीन का उदय अत्यंत अपरंपरागत रहा है। इसने कई हालातों पर परंपराओं की अवहेलना की, और उन मुद्दों का भी बलिदान किया जिन्हें बाकी मानवता पवित्र मानती है। चीन की कामयाबी को  एक यांत्रिक सफलता के रूप में देखा जाता है। नवजात चीन बढ़ता रहा और बढ़ते हुए दुनिया के लिए एक समस्या बनता चला गया। पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के अध्यक्ष माओ से लेकर राष्ट्रपति शी जिनपिंग तक, सभी के नेतृत्व में एक समान निरंतरता थी और वह थी ‘सफलता हर कीमत पर’ । चीन जब विकसित हो रहा था, उसने अपने सबसे अच्छे व्यवहार को बनाए रखा उस वक़्त उसे धन, प्रौद्योगिकी और सैन्य शक्ति के लिए बाकी दुनिया की आवश्यकता थी। चीन का उद्देश्य टकराव में पड़ना नहीं था जब तक कि वह ऐसा करने के लिए पर्याप्त रूप से सशक्त नहीं बन जाता और वास्तव में वह समय भी दूर नहीं था। जैसे-जैसे चीन दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्था और सैन्य शक्ति बनता गया, उसका रवैया भी बदलता गया। चीनी अब वैश्विक प्रभाव हासिल करने के लिए नए तरीके तलाश रहे थें। इसने अन्य राष्ट्रों के साथ आपसी व्यवहार में मूल नैतिकता और शालीनता का लबादा छोड़ दिया!

 

अविश्वसनीय रणनीति

चीन ने एक अविश्वसनीय तीन आयामी रणनीति अपनाई, एक ऐसी रणनीति जो पूरी तरह से पोलित ब्यूरो एवं राष्ट्रपति शी जिनपिंग के विज़न को समर्पित थी – पहला उन छोटे देशों के लिए जो चीन के सैन्य प्रभाव से बाहर थे – उदार पूंजी के साथ अत्यधिक निवेश। दूसरा उन देशों के लिए जो इसके सैन्य प्रभाव के भीतर थे – उन्हें अपने विशाल सैन्य शक्ति से धमकाना। और तीसरा, उन देशों के लिए जिनके पास जवाब देने सटीक की क्षमता थी, उन पर अपनी कुख्यात ‘वुल्फ वारियर’ कूटनीति से वार करना। जिसमें, चीनी राजनयिकों को मेजबान सरकार की नीतियों का लगभग अभद्र भाषा में आलोचना करने के लिए सी0सी0पि द्वारा स्वतंत्रता दी गयी। इसका उद्देश्य जानबूझकर टकराव पैदा करना था और फिर “राष्ट्रीय हित के तहत उठाए गए कदमो’ की आड़ में प्रतिबंधात्मक व्यापार नियम द्वारा उन्ही देशों पर दबाव डालना था। निवेश, रिश्वत और यहां तक कि धमकी देना, चीन ने वो सब कुछ इस्तेमाल किया जो भी दुनिया में प्रभाव बनाने में उसे फ़ायदा पहुंचा सके। चीन ने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बी0आर0आई) के रूप में अपने लिए एक ईस्ट इंडिया कंपनी तैयार की। बुनियादी ढांचे के विकास के आड़ में, इसने उन देशों में निवेश किया जिनमे उस निवेश को वापस करने का सामर्थ्य ही नहीं था । चीन ने अपनी इस चाल को बहुत अच्छी तरह से छिपाया, जब चीनी निवेश सामने आया तो वह अनुदान नहीं अत्यधिक ब्याज पर ऋण था, जिसके भुगतान की चूक गिरवी रखी गई संपत्ति को स्वचालित रूप से चीनी नियंत्रण में पहुंचा देती थी। चीनी क़र्ज़ पर डिफॉल्ट करने वाले देशों की फेहरिस्त बढ़ती रही यह देश अपने पिछले इतिहास में कभी इतने बुरे दौर से नहीं गुजरे थें। इन सब का बस एक ही कारण रहा – अवांछित चीनी निवेश। चीन एक भूखे गिद्ध की तरह बन गया जो अपने शिकार को पूरी तरह से बर्बाद कर देता है। अगर कुछ अपवादों को छोड़ दें तो चीन ने अपने लगभग सभी पड़ोसी देशों को सैन्य धमकी दी, उनके सीमाओं का उलंघन किया, और विवादित सीमाओं पर एक तरफ़ा दावा कर कब्ज़ा करने की रणनीति अपनाई। चीन इस तरह विकसित हुआ जिससे विश्व में भारी अशांति पैदा हुई है।

 

गहरी चिंता

चीन के विघटनकारी उदय ने अंतरराष्ट्रीय आचरण के सामान्य मानदंडों के लिए गहरी चिंता पैदा की। शीत युद्ध के चरम पर होने या सोवियत संघ के टूटने के बाद भी अंतर्राष्ट्रीय नियमो का पालन होता रहा है, लेकिन चीन बिना अपने असली इरादों को छिपाने का प्रयास भर किये बिना इतना कठोर व्यवहार करेगा ऐसा अपेक्षित नहीं था। विश्व चीन के उदय को बाधित करने का इरादा कभी नहीं रखता था, पूरी दुनिया के पास विकास के लिए पर्याप्त जगह है। अंतरराष्ट्रीय आचरण के कुछ जग जाहिर मानदंड हैं, राष्ट्रों का आचरण ‘पारस्परिक सम्मान की गहराई और विश्व व्यवस्था में उनके स्थान’ से निर्धारित होता है। दुनिया जानती थी कि ह्यूगो शावेज या मार्गरेट थैचर से कैसे निपटना है। लेकिन वे यह नहीं जानते थे कि एन0ए0टी0ओ की सैन्य शक्ति के साथ एक असामान्य ह्यूगो शावेज को कैसे संभालना है। यह वास्तव में एक गंभीर सिरदर्द बन गया। अगर चीन के हालिया आक्रामक आचरण को नज़रअंदाज़ कर दे तो विश्व में चीन को लेकर इतनी व्यापक चिंताय नहीं बढ़ती। चीन को प्रौद्योगिकी चोरी, कॉपीराइट उल्लंघन, गुप्त अर्थव्यवस्था और दमनकारी मानवाधिकार शासन के लिए शायद दुनिया काफी हद तक ध्यान भी नहीं देती। वहीँ चीन ने विश्व के इस ढुलमुल रवैये का भरपूर फ़ायदा उठाया। विश्व के लिए चीन आज एक असामान्य चुनौती  बन गया है जिसका सिर्फ असामान्य निवारण  ही एक मात्र रास्ता हो सकता है। इसे व्यवहार विज्ञान में एक सबक की सख्त जरूरत है – यह हर विषय पर सभी को उपदेश तो देना चाहता है लेकिन अपनी आलोचना से बेहद विचलित हो जाता है ।

चीन के साथ अगर काम करना हो तो उसके तीन पहलू हैं – राष्ट्रीय मुद्दे निश्चित नीतियों पर आधारित रखे जाएँ। दूसरा चीन एक शुद्ध कारोबारी भाषा समझता है, सद्भावना और विनम्रता इसके लिए बेकार शब्द हैं। इसके साथ सिर्फ लेन-देन का रिश्ता रखें, प्रतिबंधों या व्यापारिक संधियों को तोड़ने के बारे में सोचना भी स्पष्ट मूर्खता होगी। चीन ने आज तक अपने विकास के लिए दुनिया का उपयोग किया है, यह अब दुनिया के लिए अपने पुराने निवेश पर लाभांश वापस पाने का समय है। और तीसरा, चीन की आचरण पर अगर आपत्ति हो तो उसे सटीक जवाब दें। चीन इससे ज्यादा ध्यान देने योग्य नहीं है। आपसी व्यापार करना जारी रखें और आवश्यकता पड़ने पर अवमानना करने से भी झिझक न रखें। चीन जिस सैन्य ताकत की धमकी भरता है वह युद्ध कितना विनाशकारी हो सकता है इस बात से वह बखूबी वाकिफ है। गलवान में हुई झड़प के दौरान जब मुट्ठी भर भारतीय सैनिकों ने एक विख्यात सैन्य शक्ति का सामना किया, तो चीनी सेना की असल युद्ध की सिमिततायें प्रत्यक्ष हो गयी। चीन अपने ‘समृद्धि बनाम आंतरिक स्वतंत्रता’ के संतुलन तक पहुंचने से अभी भी कुछ दूर है, यह तब तक सफलता की सीढ़ी चढ़ता रहेगा। लेकिन जब यह वहां पहुंचेगा, तो विरोधाभास बाहर आने लगेंगे। चीन ने समृद्धि के सपने बेचकर अपनी गरीब आबादी को जिस आजादी से वंचित किया, वही लोग समृद्धि के बाद आजादी की मांग करेंगे! दुनिया को तब तक उस क्षण का इंतजार करने की जरूरत है। यदि चीन खुद चेयरमैन शी की इच्छा के अनुसार अपनी विषम अपेक्षाओं के लिए सैन्य टकराव को चुनता है, तो यह केवल उस क्षण को और करीब ले आएगा – इस तथ्यात्मक सच्चाई का सामना चीन को जल्द ही करना ही होगा!

–रवि श्रीवास्तव

(The writer has varied experience in security paradigm and is a keen follower of international geopolitics. His work has been routinely featured in national publications and newspapers. He is also the author of popular blog site geostrat.in on geo-strategic affairs.)