पिछले साल मई के महीने में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए युद्ध के बाद दोनों देशों ने उस लड़ाई से प्राप्त अनुभवों के आधार पर अपनी सेनाओं के लिए उपकरणों को हासिल करने पर ध्यान दिया है। दूसरी बातों के अलावा भारतीय वायुसेना के ध्यान पाकिस्तान के विमानों पर है। खबरें हैं कि पाकिस्तान की वायुसेना जल्द ही चीन से पाँचवीं पीढ़ी के स्टैल्थ लड़ाकू विमान शेनयांग जे-35ए हासिल करने जा रही है। पाकिस्तान को इन विमानों की पहली खेप 2026 के अंत या 2027 की शुरुआत तक मिलने की उम्मीद है।
पाकिस्तान ने चीनी कंपनी शेनयांग एयरक्राफ्ट कॉर्पोरेशन से 36 से 40 जे-35ए लड़ाकू विमानों का सौदा किया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पाकिस्तानी पायलटों का एक बैच चीन में इन विमानों के लिए सिम्युलेटर-आधारित स्टैल्थ ऑपरेशन और अन्य एडवांस्ड कॉम्बैट ट्रेनिंग ले रहा है। जे-35ए रेडार से बचने में माहिर हैं और इसे हवा से हवा में मार करने वाली पीएल-17 मिसाइलों से लैस किया जा सकता है। चीन के जे-20 और पाकिस्तान को जे-35ए स्टैल्थ विमानों के मिलने की संभावनाओं से उत्पन्न हुई क्षेत्रीय चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए भारतीय वायुसेना विभिन्न विकल्पों पर विचार कर रही है।
पाकिस्तान और चीन के कदम दक्षिण एशिया में वायु शक्ति के संतुलन को प्रभावित करेंगे, क्योंकि भारत अभी अपने स्वदेशी पाँचवीं पीढ़ी के कार्यक्रम एडवांस मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एम्का) पर काम कर ही रहा है, और सब ठीक समय से हुआ, तब भी 2035 से पहले ये विमान भारतीय वायुसेना में शामिल नहीं हो पाएँगे।
रूसी विकल्प
भारतीय वायुसेना के पास एम्का से पहले पाँचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान हासिल करने के फिलहाल दो विकल्प हैं। एक है अमेरिका का एफ-35 और दूसरा रूस का एसयू-57। अमेरिकी विमान में भारतीय वायुसेना की दिलचस्पी नहीं है। अलबत्ता भारत ने पहले पाँचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान (एफजीएफए) के लिए रूस के साथ समझौता किया था, जिसके तहत सुखोई-57 का विकास हुआ है। काम के बँटवारे के मुद्दों और विमान के पाँचवीं पीढ़ी के मानकों को पूरा करने में असमर्थता के कारण भारत ने 2018 में इस कार्यक्रम से हाथ खींच लिए थे। रूस ने अब यह विमान भारत को न केवल बेचने, बल्कि इसकी तकनीक को साझा करने की पेशकश भी की है।
रूस ने ‘मेक इन इंडिया’ के तहत एसयू-57 के भारत में संयुक्त उत्पादन और महत्वपूर्ण तकनीकें साझा करने का प्रस्ताव भी दिया है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने स्पष्ट किया है कि उनकी तरफ से इस कार्यक्रम में भारत की भागीदारी के लिए कोई सीमा या बाधा नहीं है। विमान के संयुक्त उत्पादन की संभावनाओं को तलाशने के लिए रोस्तेक और यूनाइटेड एयरक्राफ्ट कॉर्पोरेशन जैसी रूसी कंपनियों ने एचएएल की नासिक इकाई का निरीक्षण भी किया है, जहाँ एसयू-30एमकेआई विमान बनाए जाते हैं। इन कारखानों में कुछ फेरबदल करके भारत में एसयू-57 को भी बनाया जा सकता है।
एफसीएएस रद्द
हाल में यूरोप में फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम (एफसीएएस) कार्यक्रम के ठप होने की परिस्थिति में इस कार्यक्रम में फ्रांस के साथ शामिल होने का भी एक अवसर पैदा हुआ है। संकटग्रस्त छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान का यह कार्यक्रम, कई महीनों की उथल-पुथल के बाद आखिरकार ध्वस्त हो गया है। एयरबस जर्मनी और स्पेन का प्रतिनिधित्व कर रहे एयरबस और फ्रांस की प्रतिनिधि कंपनी दासो के बीच मतभेदों के कारण फ्रांस और जर्मनी ने एफसीएएस योजनाओं को छोड़ने का फैसला किया है।
जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ और फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने हाल में मोंटेनेग्रो में यूरोपीय संघ-पश्चिमी बाल्कन शिखर सम्मेलन के दौरान इस डूबते कार्यक्रम को बचाने के अंतिम प्रयास में मुलाकात की। हालांकि, लंबी चर्चा के बाद, मर्ज़ ने नेक्स्ट जेनरेशन फाइटर (एनजीएफ) प्रोजेक्ट को बंद करने की सिफारिश की, और इस बात को स्वीकार किया कि दोनों सरकारों के सर्वोत्तम प्रयासों के बावजूद उद्योग भागीदारों के बीच गतिरोध को तोड़ा नहीं जा सका।
2017 में शुरू की गई एफसीएएस को एक 100 अरब यूरो के ‘सिस्टम ऑफ सिस्टम्स’ कार्यक्रम के रूप में परिकल्पित किया गया था, जो अगली पीढ़ी के लड़ाकू विमान (एनजीएफ), एक सहायक विमान और क्रॉस-प्लेटफॉर्म सूचना साझाकरण के लिए एक लड़ाकू क्लाउड पर केंद्रित था। एफसीएएस की शुरुआत अच्छी रही, जिसमें दासो ने अगली पीढ़ी के लड़ाकू विमान की जिम्मेदारी संभाली, एयरबस ने ‘लॉयल विंगमैन’ रिमोट-कैरियर ड्रोन डिजाइन, नई क्लाउड क्षमताओं और स्टैल्थ तकनीकों को विकसित करने पर सहमति व्यक्त की, स्पेन के इंद्रा सिस्टेमास ने सेंसर सिस्टम बनाने का काम संभाला और सैफ्रान ने लड़ाकू विमान के लिए एक नया जेट इंजन विकसित किया।
एयरबस और दासो के बीच काम के बँटवारे से लेकर डिजाइन के विचार और आपूर्तिकर्ताओं के चयन जैसे मुद्दों पर गतिरोध के कारण यह परियोजना मुश्किल में पड़ गई और लगभग एक साल से लंबित पड़ी थी। जर्मन अधिकारियों ने बार-बार विकल्प सुझाया था कि अगर एनजीएफ परियोजना रद्द भी हो जाती है, तो भी एफसीएएस के साथ सहयोग जारी रखा जा सकता है।
विमान के डिजाइन और सैद्धांतिक विचार को लेकर भी दोनों पक्ष एकमत नहीं थे। फ्रांस को परमाणु-सक्षम और विमानवाहक पोत-सक्षम जेट की आवश्यकता है, जबकि जर्मनी को ऐसी कोई आवश्यकता नहीं है। वह महाद्वीपीय रक्षा संदर्भ में लंबी दूरी, अधिक भार वहन क्षमता, हवाई श्रेष्ठता और गुप्त क्षमता के लिए अनुकूलित एक भारी विमान को प्राथमिकता देता है।
इस झटके के बावजूद, एफसीएएस की तकनीकी प्रासंगिकता बरकरार है। इसकी स्टैल्थ क्षमता, बहु-क्षेत्रीय कनेक्टिविटी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा समर्थित निर्णय लेने की क्षमता, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और मानव-मानवरहित टीमिंग पर जोर देना रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बना हुआ है। फ्रांस और स्पेन को या तो इस परियोजना को छोड़ देना चाहिए, इसका पुनर्गठन करना चाहिए या नए साझेदार तलाशने चाहिए।
भारत के लिए अवसर
फरवरी 2026 में भारत-फ्रांस वार्षिक रक्षा वार्ता के दौरान, भारत ने फ्रांस की इस महत्वाकांक्षी परियोजना में शामिल होने की औपचारिक इच्छा व्यक्त की थी। एफसीएएस में विमान का डिज़ाइन, झुंड में चलने वाले ड्रोन (लॉयल विंगमैन), और अगली पीढ़ी के हथियार शामिल हैं। जून में एफसीएएस कार्यक्रम के टूटने के बाद, भारत के लिए यह एक बड़ा अवसर बन गया है। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखते हुए फ्रांस के साथ सीधे समझौता कर सकता है।
भारत उन्नत औद्योगिक सुविधाओं, इंजीनियरिंग विशेषज्ञता, वित्तीय क्षमता और रणनीतिक महत्वाकांक्षा के साथ एक स्वाभाविक विकल्प के रूप में उभरता है। भारत की भागीदारी के साथ, एफसीएएस अब भी यूके-जापान-इटली के ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम (जीसीएपी), अमेरिका और चीन को टक्कर दे सकता है।
हालाँकि 100 अरब यूरो के कार्यक्रम में 30-40 प्रतिशत हिस्सेदारी लेना चुनौतीपूर्ण लग सकता है, लेकिन यह दीर्घकालिक निवेश संप्रभुता को सुरक्षित करने के लिए अन्य एयरोस्पेस शक्तियों द्वारा की गई प्रतिबद्धताओं को दर्शाता है। भारत का हालिया 30 अरब यूरो का राफेल सौदा वायु शक्ति आधुनिकीकरण में भारी निवेश करने की उसकी तत्परता को प्रदर्शित करता है।
रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच सीमित पूँजी और अमेरिका के साथ तनावपूर्ण संबंधों से जूझ रहे फ्रांस और स्पेन को नए साझेदारों की आवश्यकता है। भारत की हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भूमिका, फ्रांस के साथ उसकी होराइज़न 2047 योजना और जनवरी 2026 में हस्ताक्षरित भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता, ये सभी सहयोग के रणनीतिक तर्क को सुदृढ़ करते हैं।
इस लड़ाकू विमान के विकास में भारत और फ्रांस के सहयोग का मामला काफी सीधा है। भारत वित्तीय योगदान, सह-विकास कार्य-साधना और भारत में सह-विनिर्माण प्रदान करके जर्मनी का स्थान ले सकता है। यह बात रेखांकित करने योग्य है कि इस समय फ्रांस के लिए अकेले छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान का डिजाइन और विकास करना एक महंगा और जोखिम भरा काम होगा। यहीं पर भारत की भूमिका सामने आती है।
एफसीएएस पर सहयोग से भारत को छठी पीढ़ी की प्रौद्योगिकियों जैसे मानव-मानवरहित टीमिंग, लड़ाकू क्लाउड नेटवर्किंग और उन्नत प्रणोदन और स्टैल्थ के संपर्क में आने में तेजी आ सकती है। यह दूसरी बार है जब भारत विमानन क्षेत्र में भविष्य की प्रौद्योगिकी के विकास के लिए किसी विदेशी देश के साथ साझेदारी कर सकता है। इसके पहले भारत ने रूस क साथ ऐसी साझेदारी की है।
एफसीएएस कार्यक्रम के लिए अधिक धन उपलब्ध कराने के अलावा, भारत के साथ साझेदारी से निर्माणाधीन लड़ाकू विमान के लिए एक बड़ा बेड़ा ऑर्डर सुरक्षित हो जाएगा, जिससे भारतीय वायु सेना के आकार और सैकड़ों विमानों की आवश्यकता को देखते हुए इसकी उत्पादन लागत में काफी कमी आएगी।
राफेल का स्थान
एनजीएफ का उद्देश्य फ्रांसीसी राफेल विमानों का स्थान लेना है, जिनका संचालन भारतीय वायु सेना भी करती है। इसके अतिरिक्त, फ्रांस की तरह, भारत भी परमाणु-सक्षम, वाहक-सक्षम विमान की तलाश में है जो उसके तीन विमानवाहक पोतों (दो परिचालन में, एक योजना चरण में) से संचालन करने में सक्षम हो।
इसका मतलब यह है कि परमाणु प्रतिरोध की भूमिकाओं को लेकर बर्लिन और पेरिस के बीच चल रहे विवाद के विपरीत, भारत और फ्रांस के बीच एफसीएएस के डिजाइन प्रोफाइल को लेकर कोई मतभेद नहीं होगा। भारत के पास वह बुनियादी ढाँचा भी मौजूद है जिसकी फ्रांस और दासो को एनजीएफ के लिए आवश्यकता होगी।
उदाहरण के लिए, आगामी समझौते के तहत फ्रांस से खरीदे जाने वाले 114 राफेल विमानों में से 90 का निर्माण भारत द्वारा किए जाने की उम्मीद है, जिसमें 50-60 प्रतिशत तक स्वदेशीकरण होगा। वहीं, फ्रांसीसी कंपनी सैफ्रान हैदराबाद में राफेल को शक्ति प्रदान करने वाले एम88 इंजन के लिए रखरखाव, मरम्मत और पुनर्निर्माण (एमआरओ) सुविधा स्थापित कर रही है, और भारत अपने स्वदेशी एएमसीए पाँचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों के लिए इंजन बनाने के लिए सैफ्रान के साथ सहयोग करने की योजना बना रहा है।
इतना ही नहीं, सैफ्रान और भारत की बीईएल (भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड) ने घरेलू स्तर पर ‘हैमर’ नामक वायु-से-सतह हथियार का उत्पादन करने के लिए भी साझेदारी की है। एफसीएएस पर सहयोग से भारत में उन्नत प्रणोदन और स्टैल्थ तकनीक, लड़ाकू क्लाउड नेटवर्किंग और मानव-मानवरहित टीमिंग जैसी छठी पीढ़ी की तकनीकों से परिचित होने की प्रक्रिया तेज हो सकती है। इससे बदले में, भारत के अपने पांचवीं पीढ़ी के एम्का के विकास में भी तेजी आ सकती है।
भारत-फ्रांस सहयोग
कुछ विशेषज्ञ कह रहे हैं कि भारत को इस कार्यक्रम में शामिल होना चाहिए। भारतीय रक्षा मंत्रालय ने इस वर्ष की शुरुआत में रक्षा संबंधी संसदीय स्थायी समिति को सूचित किया था कि वह छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान कार्यक्रम में शामिल होने में रुचि रखता है। भारत-फ्रांस के रक्षा संबंध दशकों पुराने हैं। जब भारतीय वायु सेना ने 1950 के दशक में अपना पहला फ्रांसीसी लड़ाकू विमान, तूफानी (दासो ऑरागन) हासिल किया था। इसके बाद फ्रांस के साथ कई बड़े सौदे हुए, जिनमें मिस्टीयर आईवीए, मिराज-2000, राफेल की खरीद और भारतीय नौसेना के लिए अप्रैल 2025 में राफेल-एम का सौदा शामिल है।
भारत ने अपने मल्टी-रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट कार्यक्रम के तहत फ्रांसीसी कंपनी दासो एविएशन से 114 लड़ाकू विमान खरीदने की औपचारिक प्रक्रिया शुरू कर दी है। रक्षा अधिग्रहण परिषद द्वारा स्वीकृत इस लगभग 3.25 लाख करोड़ रुपये के मेगा सौदे के तहत ‘मेक इन इंडिया’ पर जोर दिया जाएगा, जिसमें अधिकांश विमान भारत में ही बनाए जाएंगे। रक्षा मंत्रालय के अधिग्रहण विंग ने फ्रांसीसी सरकार को ‘लेटर ऑफ रिक्वेस्ट’ भेज दिया है।
फ्रांस से विस्तृत प्रतिक्रिया मिलने के बाद एक वर्ष के भीतर समझौते को अंतिम रूप देने का लक्ष्य है। 114 विमानों में से केवल 18-24 विमान ही फ्रांस से उड़ने के लिए तैयार (फ्लाई अवे) अवस्था में आएंगे। बाकी विमान भारत में ही किसी भारतीय कंपनी के साथ साझेदारी में निर्मित किए जाएंगे। इसके बाद भारतीय वायुसेना फ्रांस के बाहर राफेल विमानों की सबसे बड़ी संचालक बन जाएगी।
यह समय क्षेत्रीय खतरों के बीच अगली पीढ़ी की हवाई युद्ध क्षमताओं को हासिल करने की भारत की तत्काल आवश्यकता और रक्षा आयातक से सह-विकास-कर्ता बनने की उसकी महत्वाकांक्षा के साथ मेल खाता है। यह सक्रिय भागीदारी न केवल भारत की ‘मेक इन इंडिया’ और आत्मनिर्भर भारत पहलों को मजबूत करेगी बल्कि फ्रांस के साथ इसकी रणनीतिक साझेदारी को भी सुदृढ़ करेगी, जिससे भारत वैश्विक वायु शक्ति के भविष्य को आकार देने में एक निर्णायक हितधारक के रूप में स्थापित होगा।
प्रधानमंत्री मोदी की जून 2026 में फ्रांस यात्रा द्विपक्षीय संबंधों में एक निर्णायक बदलाव का संकेत थी। विशेष वैश्विक रणनीतिक साझेदारी के तहत राष्ट्रपति मैक्रों के साथ उनकी चर्चा पारंपरिक रक्षा और कूटनीति से आगे बढ़कर नवाचार, उन्नत प्रौद्योगिकी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर केंद्रित रही।
इनोवेशन रोडमैप 2030 को अपनाना और द्विपक्षीय एआई वर्किंग ग्रुप का गठन इस महत्वाकांक्षा को रेखांकित करता है। भारत के ‘भारत इनोवेट्स-2026’ ने इसकी तकनीकी क्षमता को और भी उजागर किया, जिससे फ्रांसीसी हितधारकों को भारत की उद्यमशीलता और इंजीनियरिंग क्षमताओं का व्यापक प्रदर्शन करने का अवसर मिला। इस यात्रा ने भारत-फ्रांस संबंधों को भविष्य की प्रौद्योगिकियों और उद्योगों के सह-विकास के लिए एक मंच के रूप में प्रभावी रूप से नया रूप दिया।