Defence Monitor

यूक्रेन युद्ध में भारत की संतुलनकारी भूमिका

यूक्रेन पर रूसी आक्रमण को लेकर भारत की प्रतिक्रिया अमेरिका और उसके सामरिक सहयोगियों की प्रतिक्रिया से अलग प्रकार की रही है। रूसी कार्रवाई के प्रति अपनी बेचैनी व्यक्ति करने के बावज़ूद भारत ने रूस के प्रति काफी संज़ीदगी के साथ सार्वजनिक रूप से तटस्थता का रुख अपनाया है। भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा, सुरक्षा परिषद और मानवाधिकार परिषद के उन प्रस्तावों पर लगातार अनुपस्थित रहने का फैसला किया, जिनमें यूक्रेन पर रूसी हमले की निंदा की गई थी। इस प्रकार भारत ने खुलकर यह विचार व्यक्त करने से खुद को रोका है कि इस संकट के लिए रूस ज़िम्मेदार है। साफ है कि भारतीय प्रतिनिधि ने इन प्रस्तावों पर अनुपस्थित रहकर रूसी कार्रवाई की प्रच्छन्न-आलोचना से आगे जाकर अपना मत व्यक्त किया है। अपनी सीमाओं को देखते हुए भारत ने अपने हितों को देखते हुए सावधानी के साथ अपना रुख व्यक्त किया है। भारत ने अपने मंतव्य को व्यक्त करते हुए चीन से भी दूरी बनाकर रखी है और महाशक्तियों के साथ संतुलन बनाकर रखा है। बहुत से देशों को, खासतौर से अमेरिका और उसके राष्ट्रपति जो बाइडन को भारत के रुख से मायूसी हुई है, क्योंकि इससे इस बात का संकेत मिला है कि विश्व-व्यवस्था के बुनियादी मुद्दों पर वॉशिंगटन और नई दिल्ली के बीच काफी मतभेद हैं।

यूक्रेन-युद्ध के कारणों वगैरह को लेकर जो भी धारणाएं हो, भारत के नीति-विचारकों का कहना है कि भारतीय-नीति अपने राष्ट्रीय-हितों के परिप्रेक्ष्य में ही समझी जा सकती है। इसकी वजह से ही भारत ने रूस की निंदा से गुरेज़ किया है, हालांकि यह भी कहा है कि युद्ध और हिंसा फौरन रुकनी चाहिए। इस बात पर दुख व्यक्त किया है कि डिप्लोमेसी के मार्ग का त्याग कर दिया गया और यह भी कहा कि बातचीत ही विवादों के हल करने का एकमात्र रास्ता हो सकती है। भारत के विदेशमंत्री एस जयशंकर ने संसद में यूक्रेन के प्रश्न पर चली बहस में हस्तक्षेप करते हुए इस बात को रेखांकित किया। भू-राजनीतिक धारणाएं इस बात को स्थापित करती हैं। यूक्रेन में तनाव से हमारी समस्याएं बढ़ी हैं। भारत सरकार को न केवल 20,000 भारतीय छात्रों के हितों के बारे में सोचना था, बल्कि उन्हें बाहर निकालकर लाना था। सरकार के सामने तलवार की धार पर चलने जैसी चुनौती थी। हमें बहुत संतुलित कदम उठाने थे। दोनों पक्षों से रिश्ते बिगाड़े बगैर, क्योंकि दोनों के साथ हमारे नजदीकी संबंध हैं।

The United Nations Security Council meets at the U.N. Headquarters in New York on Thursday, Sept. 22, 2022. The agenda for the Council’s meeting is Russia’s apparent impunity in the war, and the session was scheduled for this week to draw attention to Ukraine during the annual gathering of world leaders at the U.N. General Assembly, according to Nicolas de Rivière, France’s ambassador to the United Nations. (Haiyun Jiang/The New York Times)

रूसी हमले को लेकर भारत की बेहद संतुलित-नीति के पीछे वस्तुतः चीन और पाकिस्तान के बरक्स देश की चिंताएं हैं। भारत की नजर में ये दो देश हमारे लिए फौरी और दीर्घकालीन नजरियों से शत्रुवत हैं। रूस के साथ दोस्ती बनाए रखने से एक तो रूस को पूरी तरह चीनी खेमे में जाने से रोका जा सकेगा और पाकिस्तान के साथ रूस के नए सामरिक-सहयोग की संभावनाओं को भी पैदा नहीं होने देगा। चीन और पाकिस्तान दोनों ही रूस के साथ अच्छे रिश्ते बनाने के इच्छुक हैं, जिससे भारत को परेशानी होती है। परिणामतः भारत का लक्ष्य यह होता है कि रूस का इन दोनों के साथ रिश्ता कम से कम स्तर पर बने।

इस तरह से कह सकते हैं कि भारत की दृष्टिकोण है कि रूस की मुखर आलोचना नहीं करने पर रूस-चीन गठजोड़ और ऊँचाई पर नहीं जाएगा साथ ही पाकिस्तान और रूस के बीच नया गठजोड़ नहीं बनेगा। भारतीय सेनाओं के पास ज्यादातर शस्त्र-प्रणालियाँ रूसी हैं, इस वजह से रूस अभी भारत के लिए सबसे बड़ा शस्त्र-सप्लायर है। इन हथियारों के रख-रखाव और स्पेयर पार्ट्स की सप्लाई के लिए भी हम रूस पर आश्रित हैं। 2018 में हुए एक डील के तहत भारत ने अमेरिका के काट्सा (काउंटरिंग अमेरिकाज़ एडवर्सरीज़ थ्रू सैंक्शंस एक्ट) प्रतिबंधों के जोखिम के बावजूद एस-400 मिसाइल सिस्टम की खरीद की। भारत की समझ है कि अमेरिका काट्सा प्रतिबंधों से हमें छूट दे देगा।

भारत की समझ यह भी है कि चीन के साथ गहरी राजनीतिक और सामरिक दोस्ती के बावजूद रूस उसपर दबाव बनाकर रखता है। इतना ही नहीं रूस ने चीन को इस बात का मौका नहीं दिया है कि वह भारत के साथ उसके सैन्य-संबंधों को प्रभावित कर सके। इसलिए अपनी सीमा पर चीनी आक्रामकता को देखते हुए भी भारत ने रूस के साथ अपने रिश्तों को ठीक बनाकर रखा है। गत वर्ष 4 फरवरी को राष्ट्रपति पुतिन की बीजिंग-यात्रा के दौरान जारी रूस-चीन संयुक्त घोषणापत्र की सामरिक-शब्दावली के कारण भारत में चिंता महसूस की गई थी। एक धारणा है कि पुतिन का यूक्रेन पर हमला पश्चिम यूरोप और अमेरिका के बरक्स रूस को चीन के समर्थन का परिणाम था, जो उस संयुक्त वक्तव्य में व्यक्त हो रहा था। चीन ने रूस के हमले की निंदा नहीं की और पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों का समर्थन भी नहीं किया।

वीटो अधिकारों से लैस रूस को अपने साथ जोड़े रखने की मनोकामना ने भी भारत को रूस की आलोचना करने से रोका है। भारत की वर्तमान नीति अतीत में रूस के इसी किस्म के हमलों के समय व्यक्त प्रतिक्रिया से भी मेल खाती है। मसलन 1956 में हंगरी, 1968 में चेकोस्लोवाकिया और 1979 में अफगानिस्तान पर हुए हमलों के समय भारत ने खामोशी रखी। बावजूद इसके कि अफगानिस्तान में रूसी कार्रवाई से भारत का क्षेत्रीय-वातावरण चालीस साल तक बिगड़ा रहा, भारत ने रूसी गतिविधियों को लेकर अपने स्वर धीमे रखे।

New York, Sept 24 (ANI): External Affairs Minister Dr S Jaishankar speaks at Showcasing India-UN Partnership in Action, a special event on the sidelines of UNGA, in New York on Saturday. (ANI Photo)

भारत के साथ रूसी दोस्ती 1955 में निकिता ख्रुश्चेव के समय से शुरु हुई थी। रूस ने कभी पाकिस्तान के साथ दोस्ती नहीं की और न कभी उसे भारत के खिलाफ हथियार दिए। उसने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कश्मीर के मसले पर भारत के पक्ष में कई बार वीटो का इस्तेमाल किया। परिणामतः भारत ने बहुध्रुवीय विश्व-व्यवस्था का समर्थन किया, जिसमें किसी एक पक्ष के साथ स्थायी गठबंधन बनाने के बजाय अपने हितों के अनुरूप फैसले किए। ऐसे दौर में भी जब भारत-चीन रिश्ते खराब हैं और रूस-चीन रिश्ते अच्छे हैं, भारत ने रूस का साथ छोड़ा नहीं है। रूस केवल चीन को ही अपना विश्वसनीय सहयोगी नहीं माने, भारत ने प्रच्छन्न रूप से रूस का समर्थन इसी शा में किया है कि भविष्य में इसका लाभ मिलेगा। इसका मतलब यह नहीं है कि भारत लिबरल विश्व-व्यवस्था के महत्व को नहीं समझता है। रूस के प्रति भारत की नीति की विसंगतियों को लेकर भारत चिंतित नहीं है, क्योंकि चीन हमारा सीधे प्रतिस्पर्धी है। भारत जानता है कि अमेरिका को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की चुनौती का सामना करने के लिए भारत की मदद चाहिए, इसलिए वह रूस के प्रति भारत की सार्वजनिक तटस्थता की अनदेखी कर लेगा। हिंद-प्रशांत में अमेरिका के लिए भारत का महत्व यूरोप से भी ज्यादा है। जब तक चीन की आक्रामकता को रोकने में अमेरिका के साथ भारत सहयोग करता रहेगा, तब तक ऐसा चलेगा। इस गणित को विदेशमंत्री एस जयशंकर ने इस प्रकार व्यक्त किया है, ‘दूसरे देशों की तरह हम भी वैश्विक गतिविधियों को देखते हैं और अपने निष्कर्ष निकालते हैं। मुझपर यकीन कीजिए कि हमें इस बात की समझ है कि हमारे हित में क्या है और हम किस प्रकार से उसकी रक्षा कर सकते हैं। मैं समझता हूँ कि बदलाव सिर्फ इतना आया है कि अब हमारे पास पहले से ज्यादा विकल्प हैं।’

यूक्रेन युद्ध में भारत की संतुलनकारी-नीति से चीन के बरक्स भारत की सुरक्षा और भू-राजनीतिक हितों पर क्या प्रभाव पड़ेगा, इसका पता भविष्य में लगेगा। भारत को चुनौती भरी स्थितियों का सामना करना पड़ेगा। हमारी ताकत इस बात में है कि हम अमेरिका, यूरोप और रूस के साथ दोस्ताना रिश्ते बनाकर रखें और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहें, जिसमें क्वॉड के सदस्य की भूमिका शामिल है।