दक्षिण एशिया के देशों में पाकिस्तान जहाँ भारत का सबसे बड़ा प्रतिस्पर्धी है, वहीं बांग्लादेश की सरकार अनेक मामलों में भारत की मित्र है। वहाँ जब भी अवामी लीग की सरकार होती है, तब बांग्लादेश के रिश्ते हमारे साथ अच्छे होते हैं। बांग्लादेश को इस बात का श्रेय जाता है कि वह धार्मिक-कट्टरपंथ से सीधे टकराव मोल लेकर चल रहा है। वहाँ की राजनीति में भारत का कट्टर विरोधी वर्ग भी है, पर सरकार उनका मुकाबला करती है। इसका सबसे बड़ा श्रेय वहाँ की प्रधानमंत्री शेख हसीना को जाता है।
दक्षिण एशिया में विभाजन की कड़वाहट अभी तक कायम है, पर यह एकतरफा और एक-स्तरीय नहीं है। पाकिस्तान का सत्ता-प्रतिष्ठान भारत-विरोधी है, फिर भी वहाँ जनता के कई तबके ‘भारत में अपनापन’ भी देखते हैं। बांग्लादेश का सत्ता-प्रतिष्ठान भारत-मित्र है, पर कट्टरपंथियों का एक तबका ‘भारत-विरोधी’ भी है। पिछले 52 साल का अनुभव है कि बांग्लादेश जब उदार होता है, तब भारत के करीब होता है। जब कट्टरपंथी होता है, तब भारत-विरोधी। शेख हसीना के नेतृत्व में अवामी लीग की सरकार के साथ भारत के अच्छे रिश्तों की वजह है 1971 की वह ‘विजय’ जिसे दोनों देश मिलकर मनाते हैं। वही ‘विजय’ कट्टरपंथियों के गले की फाँस है।
यह सवाल बार-बार पूछा जाता है कि कब तक शेख हसीना बांग्लादेश को इस रास्ते पर ले जाने में सफल होंगी? अगले साल भारत के लोकसभा चुनाव के पहले बांग्लादेश में चुनाव होने जा रहे हैं। ये देश के 12वें आम चुनाव होंगे। मुख्य चुनाव आयुक्त काजी हबीबुल अवल ने घोषणा की है कि 7 जनवरी को चुनाव होंगे। दूसरी तरफ विरोधी दल बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) और उसके सहयोगी दल पारदर्शी चुनाव कराने के लिए निर्दलीय अंतरिम सरकार बनाने की मांग करते हुए हिंसक विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।
उनका कहना है कि सत्ताधारी अवामी लीग और प्रधानमंत्री शेख़ हसीना के कारण निष्पक्ष चुनाव नहीं हो सकते। अवामी लीग सरकार ने उनकी माँग को खारिज कर दिया है और कहा है कि चुनाव प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार के तहत ही होंगे। अवामी लीग चौथी बार लगातार सत्ता में वापसी करना चाहेगी, जबकि ख़ालिदा जिया की पार्टी ने चुनावों के बहिष्कार की धमकी दी है।
2009 के बाद से सत्ता पर काबिज़ 76 वर्षीय शेख हसीना विश्व की सबसे ज्यादा समय तक किसी देश की सरकार चलाने वाली महिला हैं। इससे पहले वे 1996 से 2001 तक सत्ता में रहीं। टाइम मैगजीन ने अपने अंक में उन्हें कवर पेज पर रखा है। हसीना के प्रयास से 17 करोड़ जनसंख्या वाला देश जूट उत्पादक से एशिया प्रशांत क्षेत्र में सबसे तेजी से विकसित हो रही उभरती अर्थव्यवस्था बन गया है।
जब से चुनाव की तारीखों की घोषणा की गई है, चुनाव की पारदर्शिता को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। खासतौर अमेरिकी सरकार ने जो संदेह व्यक्त किए हैं, वे महत्वपूर्ण हैं। बांग्लादेश सरकार को ऐसे में भारतीय समर्थन की दरकार है, पर भारत सरकार बांग्लादेश की राजनीति में सीधे किसी पक्ष का साथ नहीं देगी। भारत के विदेश सचिव विनय मोहन क्वात्रा ने स्पष्ट किया कि बांग्लादेश के चुनाव उनका आंतरिक मामला है। तीसरे देश की नीति पर टिप्पणी करना हमारा अधिकार नहीं है। बांग्लादेश में चुनाव उनका घरेलू मामला है। बांग्लादेश के लोगों को अपना भविष्य तय करना है।
भारत ने अनुभव के साथ सीखा है। 2014 के चुनाव में भारत ने दिलचस्पी दिखाई थी और हमारी तत्कालीन विदेश सचिव सुजाता सिंह ढाका गईं थीं। उस चुनाव में खालिदा जिया के मुख्य विरोधी-दल बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी ने चुनाव का बहिष्कार किया था। दुनिया के कई देश उस चुनाव की आलोचना कर रहे थे। भारत ने समर्थन किया था, इसलिए कि बांग्लादेश में अस्थिरता का भारत पर असर पड़ता है। बहरहाल उस विवाद से सबक लेकर भारत ने 2018 के चुनाव में ऐसा कोई प्रयास नहीं किया, जिससे लगे कि हम उनकी चुनाव-व्यवस्था में हस्तक्षेप कर रहे हैं। उस चुनाव में अवामी लीग ने कुल 300 में से 288 सीटों पर विजय पाई।
मीडिया में प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार गत 10 नवंबर को दिल्ली में अमेरिका व भारत के रक्षा और विदेश मंत्रियों के बीच हुई ‘टू प्लस टू वार्ता’ में बांग्लादेश के चुनाव का मुद्दा उठा था। भारत मानता है कि जब हिंद प्रशांत क्षेत्र की स्थिति को लेकर अमेरिका व भारत एक साथ काम कर रहे हैं तब बांग्लादेश की मौजूदा सरकार की नीतियां ज्यादा सकारात्मक साबित हो सकती हैं। भारत व अमेरिका की बैठक के बाद ही बांग्लादेश के चुनाव आयोग ने चुनाव की तिथि की घोषणा की। बताया जा रहा है कि इस घोषणा के दिन ही ढाका में अमेरिका के राजदूत पीटर हस छुट्टी पर चले गए।
पिछले दिनों अमेरिकी प्रशासन ने अवामी लीग और बीएनपी को चिट्ठी भेजकर सलाह दी थी कि वे आपस में बात करके चुनाव के लिए माहौल बनाएं। बीएनपी का कहना था कि संवाद स्थापित करना सरकार की ज़िम्मेदारी है, जबकि अवामी लीग ने कहा था कि संवाद के लिए समय नहीं है। इस बीच, ज़्यादा दबाव सत्ताधारी दल पर है। हाल में देश में मजदूरों का जबर्दस्त आंदोलन भी शुरू हुआ है, जिसे लेकर अमेरिका ने चेतावनी भी दी है कि अगर बांग्लादेश में कामगारों के अधिकारों से समझौता हुआ तो व्यापार पर प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
7 जनवरी के चुनाव को लेकर कई प्रकार से संशय कायम हैं। यह स्पष्ट नहीं है कि बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) चुनाव में भाग लेगी या नहीं। दूसरी तरफ देश के सुप्रीम कोर्ट ने सबसे बड़ी इस्लामिक पार्टी जमात-ए-इस्लामी को आम चुनावों में भाग लेने की इजाज़त नहीं दी है। जमात ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर 2013 में लगाए गए प्रतिबंध को हटाने की अपील की थी। उस समय उच्चतम अदालत ने धर्मनिरपेक्षता के संवैधानिक प्रावधान का हवाला देते हुए जमात के चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी थी और चुनाव आयोग में इसका पंजीकरण रद्द कर दिया था।
पाकिस्तान से बांग्लादेश को अलग करने के ख़िलाफ़ रहे जमात के नेता मतीउर रहमान निज़ामी को 2016 में फाँसी दी गई थी। उनके अलावा भी जमात के कई नेताओं को बांग्लादेश में फाँसी और उम्रक़ैद की सज़ा दी जा चुकी है। बांग्लादेश के चीफ़ जस्टिस ओबेदुल हसन की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट के पाँच सदस्यों वाली बेंच ने जमात-ए-इस्लामी की याचिका की सुनवाई की थी। जमात के मुख्य वकील निजी समस्याओं का हवाला देते हुए ग़ैर-हाज़िर रहे और उन्होंने छह हफ़्तों के लिए सुनवाई टालने की अपील की थी। अंततः कोर्ट ने उनकी दरख़्वास्त और पार्टी की ओर से दायर अपील, दोनों को ख़ारिज कर दिया।
अदालत का कहना है कि इस संगठन के राजनीति में हिस्सा लेने पर रोक नहीं है, लेकिन यह किसी चुनाव चिह्न पर एक दल के रूप में चुनाव नहीं लड़ सकती।
अदालत का यह फ़ैसला उस समय आया, जब जमात पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने की मांग की जा रही है, क्योंकि वह 1971 में पाकिस्तान के ख़िलाफ बांग्लादेश की स्वतंत्रता की लड़ाई के ख़िलाफ़ थी। देश के मुख्य विरोधी दल बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के साथ जमात के क़रीबी रिश्ते हैं। 2001 से 2006 तक जब बीएनपी की खालिदा जिया प्रधानमंत्री थीं, जमात भी सत्ता में भागीदार थी।
2009 में अवामी लीग के सत्ता में आने के बाद प्रधानमंत्री शेख़ हसीना ने अपनी प्रतिद्वंद्वी ख़ालिदा जिया की पार्टी बीएनपी की मुख्य सहयोगी, जमात के शीर्ष नेताओं पर जनसंहार और युद्ध अपराधों को अंजाम देने के मुक़दमे चलाए। यह बांग्लादेश की चौथी सबसे बड़ी पार्टी है, पर पंजीकृत नहीं है। इसे बड़े पैमाने पर लोगों का समर्थन भी हासिल है, जिस बात का पता जमात की रैलियों में जुटने वाली भीड़ से भी लगाया जा सकता है।
देश में 2014 के आम चुनाव भारी हिंसा के बीच हुए थे और बीएनपी जैसी पार्टियों ने इनका बहिष्कार भी किया था। 2018 के चुनावों में विपक्षी दलों ने भी हिस्सा लिया था, पर बाद में उन्होंने धांधली का आरोप लगाया था।
अवामी लीग इस समय 14 दलों के गठबंधन के साथ सत्ता में है। राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि बीएनपी चुनाव का बहिष्कार करेगी, तो अवामी लीग सत्ता में आ जाएगी। ऐसे में ये सभी घटक दल अवामी लीग के साथ बनकर रहना चाहेंगे। दुनिया के मुस्लिम-बहुल देशों में बांग्लादेश का एक अलग स्थान है। वहाँ धर्मनिरपेक्षता बनाम शरिया-शासन की बहस है। बांग्लादेश इस अंतर्विरोध का समाधान करने में सफल हुआ, तो उसकी सबसे महत्वपूर्ण सफलता माना जाएगा।
भारत-बांग्ला रिश्ते
भारत-बांग्लादेश रिश्तों में विलक्षणता है। दोनों एक-दूसरे के लिए ‘विदेश’ नहीं हैं। 1947 में जब पाकिस्तान बना था, तब वह ‘भारत’ की एंटी-थीसिस के रूप में उभरा था, और आज भी खुद को भारत के विपरीत साबित करना चाहता है। अपने ‘सकल-बांग्ला’ परिवेश में बांग्लादेश, ‘भारत’ जैसा लगता है, विरोधी नहीं। ऐसे लोग भी हैं, जिन्हें ऐसी एकता पसंद नहीं, हमारे यहाँ और उनके यहाँ भी। बांग्लादेश के कुछ विश्लेषक, शेख हसीना के विरोधी खासतौर से मानते हैं कि पिछले एक दशक में भारत का प्रभाव कुछ ज़्यादा ही बढ़ा है। तब इन दिनों जो मैत्री नजर आ रही है, वह क्या केवल शेख हसीना की वजह से है? ऐसा है, तो उनके बाद क्या होगा?
पचास साल का अनुभव है कि बांग्लादेश जब उदार होता है, तब भारत के करीब होता है। जब कट्टरपंथी होता है, तब भारत-विरोधी। शेख हसीना के नेतृत्व में अवामी लीग की सरकार के साथ भारत के अच्छे रिश्तों की वजह है 1971 की वह ‘विजय’ जिसे दोनों देश मिलकर मनाते हैं। वही ‘विजय’ कट्टरपंथियों के गले की फाँस है। पिछले 12 वर्षों में अवामी लीग की सरकार ने भारत के पूर्वोत्तर में चल रही देश-विरोधी गतिविधियों पर रोक लगाने में काफी मदद की है। भारत ने भी शेख हसीना के खिलाफ हो रही साजिशों को उजागर करने और उन्हें रोकने में मदद की है।
बांग्लादेश की स्वतंत्रता के बाद 1972 में भारत-बांग्लादेश के बीच 25-वर्ष की एक मैत्री-संधि हुई थी। उस संधि के बाद 1973 में एक व्यापार समझौता हुआ और 1974 में मुजीब-इंदिरा सीमा समझौता हुआ। इन समझौतों में भविष्य की योजनाएं थीं, पर 1975 में शेख मुजीबुर्रहमान की हत्या के बाद इन रिश्तों को धक्का लगा। बांग्लादेश में भारत-विरोधी ताकतें सक्रिय हो गईं। उसके बाद 2009 में अवामी लीग की सरकार की वापसी तक जितनी सरकारें भी वहाँ बनीं उन्होंने इतिहास को विकृत करने का काम किया और अपने नागरिकों के मन में भारत के प्रति घृणा भरने का काम किया। एक पूरी पीढ़ी के दिमाग़ में ये विचार भरे गए।
इस्लाम और धर्मनिरपेक्षता
अब बांग्लादेश एक निराला प्रयोग करना चाहता है। स्वतंत्र देश बनने के बाद उसने धर्मनिरपेक्षता को अंगीकार किया था, पर 1975 में शेख मुजीब की हत्या के बाद व्यवस्था बदली और 1988 में फौजी शासक एचएम इरशाद ने इस्लाम को राष्ट्रीय धर्म घोषित कर दिया। कुछ साल पहले अवामी लीग सरकार के सूचना मंत्री मुराद हसन ने कहा कि देश में 1972 के धर्मनिरपेक्ष संविधान की वापसी और राष्ट्रीय धर्म के तौर पर इस्लाम की मान्यता ख़त्म होगी।
मुराद हसन ने यह घोषणा गत 14 अक्टूबर, 2021 को की थी। ऐसे वक़्त में, जब देश में ईशनिंदा की अफ़वाहों को लेकर हिंदुओं पर हमले हो रहे हैं, जवाब में जमात-ए-इस्लामी और हिफ़ाज़त-ए-इस्लाम जैसे कट्टरपंथी समूहों ने धमकी दी कि बिल पेश किया तो खून की नदियाँ बहेंगी। शेख हसीना धर्मनिरपेक्षता की वापसी चाहती हैं, पर क्या अवामी लीग के भीतर इस प्रश्न पर आम सहमति है? कहना मुश्किल है।
अफगानिस्तान का अनुभव है कि लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकारें यदि आत्मरक्षा न कर पाएं, तो उनका अस्तित्व दाँव पर रहता है। बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार ने बहुत बड़ा संकल्प हाथ में ले लिया है। देश में कट्टरपंथियों का मुकाबला करने वाला एक बड़ा प्रगतिशील तबका भी मौजूद है। क्या वे कट्टरपंथियों को काबू में रख पाएंगी और कब तक?
पिछला चुनाव जीतने के बाद शेख हसीना ने कहा था कि 2023 के बाद मेरी दिलचस्पी प्रधानमंत्री बनने में नहीं है। उनके नेतृत्व में बांग्लादेश ने आर्थिक प्रगति की है और कट्टरपंथी तबकों को काबू में किया है, पर उन्हें लोकतांत्रिक मूल्यों का रक्षक नहीं माना जा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति की तरफ से 2021 में बुलाए गए लोकतांत्रिक देशों के शिखर सम्मेलन में पाकिस्तान को बुलाया गया, बांग्लादेश को नहीं। तुर्रा यह कि पाकिस्तान ने चीन के प्रति अपना समर्थन दिखाने के लिए सम्मेलन का बहिष्कार किया, जबकि बांग्लादेश इसमें शामिल होने को उत्सुक था।
संबंधों की वापसी
भारत-बांग्लादेश सीमा चार हजार 96 किलोमीटर लंबी है। दोनों देश 54 नदियों के पानी का साझा इस्तेमाल करते हैं। दक्षिण एशिया में भारत का सबसे बड़ा व्यापार-सहयोगी बांग्लादेश है। 2009 में अवामी लीग की सरकार बनने के बाद भारत के साथ बांग्लादेश के संबंधों में तेज़ी से सुधार हुआ। ऐसे कई मुद्दों पर समझौते हुए जो दशकों से अटके पड़े थे। 2014 में तकरीबन चार दशक से चले आ रहे समुद्री सीमा विवाद का खत्म होना रिश्तों के महत्व को स्थापित कर गया।
इसके पहले 2012 में बांग्लादेश और म्यांमार के बीच भी इसी प्रकार का एक निपटारा हुआ था। बंगाल की खाड़ी से जुड़े तीनों देश अरब सागर के आर्थिक दोहन के लिए मिलकर काम कर सकेंगे। सन 2006 में भारत ने इस इलाके में लगभग 100 ट्रिलियन घन फुट प्राकृतिक गैस होने का पता लगाया था। माना जाता है कि यहाँ का गैस भंडार कृष्णा कावेरी बेसिन में उपलब्ध गैस का लगभग दुगना है। विवादों के कारण इस इलाके में तेल खोजने का काम रुका हुआ था।
2015 में दोनों देशों के बीच लैंड बाउंडरी एग्रीमेंट (एलबीए) के तहत 111 एनक्लेव का हस्तांतरण हुआ। अप्रैल, 2017 में परमाणु ऊर्जा सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे। बांग्लादेश के पहले नाभिकीय बिजलीघर के लिए भारत और रूस के साथ त्रिपक्षीय समझौता है। अब सामरिक सहयोग की दिशा में भी काम हो रहा है। बांग्लादेश के पहले एयरशो में भारत भी हिस्सा लेगा। विदेश सचिव हर्ष वर्धन श्रृंगला ने पिछले साल मार्च में कहा था कि भारत बांग्लादेश को किसी भी प्रकार का सैनिक साजो-सामान दे सकता है।
बिमस्टेक की भूमिका
भारत और बांग्लादेश बिमस्टेक (बे ऑफ बंगाल इनीशिएटिव फॉर मल्टी-सेक्टोरल टेक्नीकल एंड इकोनॉमिक को-ऑपरेशन) के सदस्य हैं। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की सक्रिय भागीदारी और क्वॉड देशों के समूह में शामिल होने के बाद बंगाल की खाड़ी एक तरफ रक्षा सहयोग का केंद्र बनेगी, दूसरी तरफ इसके चारों तरफ के देश भारत, बांग्लादेश, म्यांमार, थाईलैंड, भूटान, नेपाल और श्रीलंका के विकास की धुरी भारत बनेगा।
इस क्षेत्र में गैस के भंडार हैं, जिनके दोहन में भारत की भूमिका होगी। इंफ्रास्ट्रक्चर विकास और सड़कों, पुलों, नागरिक उड्डयन, बंदरगाहों और रेलवे के विकास में जापान जैसे देश के साथ मिलकर त्रिपक्षीय समझौतों की सम्भावनाएं बन रहीं है। हालांकि बिमस्टेक का काम धीमा है, पर भविष्य में इसकी भूमिका बढ़ेगी।
काफी बातें 7 जनवरी के चुनाव के बाद की राजनीतिक स्थितियों पर निर्भर करेंगी।