वन चाइना पॉलिसी
चीन ने समाजवाद के एक गहन युग के दौरान अपनी स्वतंत्रता पाई, जिसका नेतृत्व कुओमितांग (के0एम0टी) के च्यांग काई-शेक ने किया। जापान के खिलाफ स्वतंत्रता के लिए संघर्ष अतयंत वीभत्स था। के0एम0टी के नेतृत्व में शाही दमन के खिलाफ विद्रोह ने राष्ट्र को मजबूती से बांध दिया, लेकिन इसकी राजनीति दो मुख्य व्यक्तित्वों के0एम0टी0 के च्यांग काई-शेक और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सी0सी0पी0) के माओ त्से तुंग के बीच विभाजित हो गई। आपसी दुश्मनी गंभीर थी, हजारों सीसीपी कैडरों के नरसंहार के बाद पूरा देश गृह युद्ध में डूब गया, लेकिन इस लड़ाई में के0एम0टी0 को ताइवान तक सिमित होना पड़ा। दोनों दावेदारों ने अपने नियंत्रण में क्षेत्र को चीन के रूप में घोषित किया, एक को आधिकारिक तौर पर माओ के तहत पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना (पी0आर0सी0) के रूप में नामित किया गया, जो अब मुख्यभूमि चीन है और चियांग काई-शेक के तहत द्वीप क्षेत्र चीन गणराज्य (आर0ओ0सी0) का नाम दिया, जिसे ताइवान के रूप में जाना जाता है।
‘वन चाइना’ शब्द का इस्तेमाल पहली बार 1972 में पीआरसी और अमेरिका के बीच संयुक्त विज्ञप्ति में दोनों देशों के बीच संबंधों को औपचारिक बनाने के लिए किया गया था। बाद में पी0आर0सी0 द्वारा इसे ‘वन चाइना पॉलिसी’ के रूप में प्रचारित किया गया। जैसे-जैसे चीन समृद्धि और विकास की ओर बढ़ा, इसने दुनिया भर से भारी व्यापार और निवेश को आकर्षित किया। उन्होंने बहुत चतुराई से अपने व्यापारिक संबंधों को व्यापारिक भागीदारों से ‘वन चाइना पॉलिसी’ पर सहमत होने की प्रतिबद्धता के साथ जोड़ा। ‘वन चाइना पॉलिसी’ एक बड़े प्रोपेगैंडा से कम नहीं थी, जिसे चीन ने ताइवान पर पीआरसी के दावे के प्रति अंतरराष्ट्रीय समुदाय की एक अटल प्रतिबद्धता के रूप में प्रचारित किया।
ऐतिहासिक विडंबना
यह महत्वपूर्ण घटना रही की दिसंबर 1949 तक, के0एम0टी0 ने पूरे मुख्य भूमि चीन और ताइवान पर शासन किया, लेकिन गृह युद्ध में हार ने उसे मुख्य भूमि से बहार कर दिया। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद चीन की आजादी का श्रेय अगर किसी को दिया जा सकता है तो वह के0एम0टी0 था, न कि सी0सी0पी, जो बहुत बाद में सामने आया और 1949 के गृह युद्ध के बाद ही उसे मान्यता मिली। उल्लेखनीय रूप से, इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ है कि सी0सी0पी0 के पास चीन और ताइवान के पूरे भू-भाग पर नियंत्रण रहा हो, उस पर शासन करना तो दूर की बात है। सी0सी0पी0 का एक ऐसे क्षेत्र पर दावा करना जिस पर उसने कभी शासन नहीं किया, एक ऐतिहासिक विडंबना बनी हुई है।
भूमि सुधारों और अनुकूल नीतियों के कारण ताइवान ने 60 के दशक के मध्य में एक आर्थिक चमत्कार का अनुभव किया। ताइवान ने 80 के दशक में लोकतांत्रिक सुधारों की शुरुआत की और 90 के दशक में पूर्ण लोकतंत्र बन गया। इसके विपरीत, चीन ने एक पार्टी की नीति के साथ अपने समाजवादी दृष्टिकोण को जारी रखा, जिसमें सभी पोलित ब्यूरो से जुड़े हुए थें। यह सभी राष्ट्रीय मामलों पर एक पक्ष की पकड़ को दर्शाता है। ताइवान का आर्थिक चमत्कार पी0आर0सी0 के लिए 180 डिग्री टर्नअराउंड के रास्ते पर जाने के लिए प्रेरणा बन गया। 80 के दशक के अंत में चीन ने शियाओपिंग के नेतृत्व में पश्चिमी पूंजीवाद को पूरी तरह से अपना लिया। एक राष्ट्र जो अपने नागरिकों के लिए स्थापित होने का दावा करता है, वहीँ मानवाधिकार और लोगों की बुनियादी स्वतंत्रता से उन्हें वंचित रखता है। सच्चाई समझने के लिए दुनिया को केवल आठ दशक पीछे जाने की आवश्यकता है जब चीन एक स्वतंत्र राज्य के रूप में, एक hi राजनीतिक दल – के0एम0टी0 द्वारा शासित था, जब सी0सी0पी0 की कोई पहचान भी नहीं थी। ये तथ्य ताइवान के क्षेत्र पर धोखाधड़ी भरे चीन के दावे को ध्वस्त करते हैं।
कूटनीतिक आचरण
चीन में सी0सी0पी को आमतौर ‘पार्टी’ के रूप में जाना जाता है, जिसके लिए पार्टी सर्वोपरि रहती है। समाजवाद की आड़ में, इस पार्टी ने पहले सभी सामाजिक और राष्ट्रीय संस्थानों में प्रवेश किया और बाद में चीन में पूरे सामाजिक व्यवस्था का एक अनिवार्य हिस्सा बन गया। पोलित ब्यूरो का फरमान चीनी राष्ट्रीयता के पूरे तबके में गूंजने लगा। विडंबना यह है कि चीन अपने स्वयं के परिकल्पना का शिकार हो गया! इसने विश्वास करना शुरू कर दिया कि ‘पार्टी सर्वोच्च है’ और यह परिकल्पना चीन के बहार भी लागू होती है। लोकतांत्रिक जवाबदेही के अभाव में पार्टी के एजेंडे से गहरे रंग में रंगे चीनी नेताओं और नौकरशाहों के आचरण में एक स्वअहंकार विकसित हो गया, जो राजनयिक आचरण तक फैल गया। चीनी शासन तंत्र में बातचीत के लिए कोई जगह नहीं है, क्योंकि पोलित ब्यूरो की सलाह पर कोई सवाल नहीं पूछ सकता। इन हालातों के बीच फिर कूटनीतिक आचरण कैसे अलग हो सकता है? दुर्भाग्य से, न तो किसी को इसकी उम्मीद थी और न ही इसके लिए विश्व तैयार था।
अधिकांश देशों के लिए आर्थिक ज़रूरतें न्यूनतम स्वीकार्य मानवाधिकारों के लिए उनकी प्रतिबद्धताओं की तुलना में ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए। हर किसी को लगा कि वे खुद को प्रभावित किए बिना चीनी आर्थिक तेज़ी का लाभ उठा सकते हैं। आज जो देश चीन से शिकायत रखते हैं, उन्हें आत्मनिरीक्षण करने की आवश्यकता है, क्योंकि वे खुद चीन को मुनाफे की राजनीती के लिए प्रोत्साहित करने के लिए जिम्मेदार थे। जब एक तरफ अमेरिका ‘वन चाइना पॉलिसी’ की पुष्टि करता है और दूसरी तरफ यह भी कहता है कि ‘अमेरिकी ताइवान की रक्षा करेगा तो विश्व को वह क्या संकेत देना चाहता है? इसके अलावा यूरोपीय संघ को भी जवाब देना चाहिए की – कुछ ही महीनों के भीतर वास्तव में ऐसा क्या हुआ कि चीन के साथ निवेश पर एक व्यापक समझौते को पूरा करने के लिए वर्षों की मेहनत को आनन-फानन में नकार दिया गया। सभी उत्तरों का एक ही तर्क है कि – राष्ट्रीय सुरक्षा कि इकनोमिक रिटर्न्स पर हमेशा प्राथमिकता होगी। कोविड के बाद क्षेत्रीय दावों, आक्रामक सैन्य युद्धाभ्यास और ताइवान पर बलपूर्वक इरादे का प्रदर्शन शायद चीन ने बहुत तेजी से और बहुत जल्दी किया है। विश्व द्वारा सामूहिक प्रतिक्रिया का प्रभाव है जिससे सी0सी0पी0 के भीतर निराशा बढ़ी है। मिसाल के तौर पर अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चैन के लचीलेपन को मजबूत करने के लिए बड़ी संख्या में उद्योगों को स्थानांतरित किया गया है। क्वाड और ए0यू0के0यू0एस0 ने आकार लिया है और तेजी से सुरक्षा ढांचे का निर्माण किया है। वहीँ अमेरिका ने प्रभावी रूप से दक्षिण चीन सागर में एक सैन्य मोर्चा बनाया है। भारत ने गलवान में चीन के घुसपैठ की कार्यवाही को माफ करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई है, आंतरिक रूप से रियल एस्टेट बस्ट ने चीन को खरबों डॉलर का नुकसान पहुंचाया है, आज चीन की अर्थव्यवस्था में कड़ी चुनौतियां हैं। चीनी नेतृत्व और सी0सी0पी0, शायद पहली बार भौतिकी के नियमों के साथ खुद को परिचित करा रहा है की – हर क्रिया की समान और विपरीत प्रतिक्रिया होती है।
सी0सी0पी0 को यह ज्ञात है कि चीन के लिए कुछ बदल रहा है, विश्व द्वारा जवाबी कार्रवाई वास्तविक है, राष्ट्रों की प्रतिक्रिया कुछ अलग है। ताइवान के सवाल पर तो निश्चित रूप से मजबूत जवाबी कार्यवाही के संकेत हैं। चीन को अपनी सीमाओं का अनुभव जरूर हुआ है, जब एक के बाद एक ताइवान पर उसके गंभीर बयानों को स्पष्ट रूप से नजरअंदाज कर दिया गया, चीन की गहरी साजिश धीरे-धीरे अब जग जाहिर होती जा रही है!
– रवि श्रीवास्तव
(The writer has varied experience in security paradigm and is a keen follower of international geopolitics. His work has been routinely featured in national publications and newspapers. His articles can be viewed on the popular blog site newsanalytics.co.in on geo-strategic affairs.)

