भारतीय नौसेना के प्रमुख एडमिरल आर हरि कुमार ने गत 30 नवंबर को नौसेना स्टाफ के 25वें प्रमुख के रूप में भारतीय नौसेना की कमान संभाली। एडमिरल हरि कुमार ने एक महत्वपूर्ण दौर में यह कार्यभार ग्रहण किया है, जब भारतीय नौसेना एक तरफ अपने उपकरणों के मामले में आधुनिकीकरण कर रही है, वहीं राष्ट्रीय-सुरक्षा के संरचनात्मक बदलाव का कार्य भी चल रहा है। भारतीय सेनाएं अपने आधुनिकीकरण के महत्वपूर्ण दौर से गुजर रही हैं। एक तरफ नए पोत नौसेना में शामिल हो रहे हैं वहीं दूसरी तरफ नौसेना अपने 15-वर्षीय समुद्री क्षमता परिप्रेक्ष्य परियोजना में संशोधन का कार्य कर रही है। नौसेना में छह नाभिकीय शक्ति-चालित पनडुब्बियों और एक तीसरे विमानवाहक पोत को शामिल करने पर भी विचार चल रहा है। सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण मसला है हिंद-प्रशांत क्षेत्र में नौसेना की नई भूमिका। अरब सागर में चीन और पाकिस्तान की गतिविधियाँ भी इस समय नौसेना के लिए चिंता का विषय हैं। इन्हीं विषयों को लेकर डिफेंस मॉनिटर ने एडमिरल आर हरि कुमार के साथ विशेष साक्षात्कार किया, जिसके अंश:
अफगानिस्तान और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बदलते हालात के मद्देनज़र भारतीय नौसेना के सामने किस प्रकार की नई चुनौतियों को आप देख पा रहे हैं?
हाल के वर्षों में भारत की समुद्री-सुरक्षा के संकेतकों में खासी जटिलता नजर आई है। हमारे समुद्री-हितों के सामने परम्परागत और गैर-परम्परागत स्रोतों से खतरे खड़े हुए हैं। भारतीय नौसेना ऐसी गतिविधियों और प्रवृत्तियों पर नजर रखती है, जिनसे समुद्री-सुरक्षा प्रभावित होती है। हाल के वर्षों में गैर-पारम्परिक खतरे भी उपस्थित हुए हैं, जैसे कि समुद्री-आतंकवाद, पायरेसी, डाकाजनी, अवैधानिक या अविनियमित फिशिंग, मनुष्यों, हथियारों या नशे की तस्करी वगैरह। इन बातों की वजह से समुद्री-सुरक्षा को लेकर नए सिरे से सोचने की जरूरत महसूस की गई है। हाल में समुद्री-आतंकवाद का काफी विस्तार हुआ है और वह नए तौर-तरीकों के साथ उभर रहा है। यह एक नया खतरा है, जो सम्भवतः परम्परागत चुनौतियों के साथ जुड़कर भी उभर रहा है। पायरेसी और सशस्त्र डकैतियाँ भी पिछले दशक में नए इलाकों में हुई हैं। अंतरराष्ट्रीय नौ परिवहन और समुद्र-यात्रियों के सामने यह बड़ा खतरा है। गैर-विनियमित गतिविधियों की निरंतर चुनौती और ‘मैरीटाइम डोमेन अवेयरनेस’ से जुड़ी सीमाएं कुछ नई चुनौतियों को जन्म दे सकती हैं। पिछले दशक में प्राकृतिक आपदाएं और क्षेत्रीय अस्थिरताएं भी बढ़ी हैं। इसके कारण भारतीय नौसेना की मानवीय सहायता और आपदा राहत से जुड़े एचएडीआर ऑपरेशंस और नॉन कॉम्बैटेंट इवैक्युएशन ऑपरेशंस (एनईओ) से जुड़ी तैनाती भी बढ़ गई है। इसलिए भारत को अपने सामने खड़े खतरों पर नजर रखने की प्रक्रिया को लगातार जारी रखने की जरूरत है। यह काम हम विभिन्न देशों की एजेंसियों के समन्वय से करते हैं। इस तरह के गैर-परम्परागत खतरों का सामना करने के लिए कुछ मामलों में क्षमता को बढ़ाने और इस क्षेत्र में व्यापक सहयोग की दरकार है। भारतीय नौसेना समुद्री डोमेन को प्रभावित करने वाली सभी गतिविधियों पर नजर रखती है और उनके बारे में अपनी नीतिगत और ऑपरेशनल योजनाएं तैयार करती है।