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लश्करे-तैयबा का पिट्ठू संगठन टीआरएफ

‘ऑपरेशन सिंदूर’ शुरू होने के पहले से पाकिस्तान और चीन की ओर से कहा गया था कि पहलगाम हमले की निष्पक्ष अंतरराष्ट्रीय जाँच होनी चाहिए। एक तरह से यह बात प्रत्यक्षतः उपलब्ध तथ्यों को नकारते हुए कही गी थी। भारत ने बार-बार कहा है कि इसके पीछे लश्करे-तैयबा के पिट्ठू संगठन द रेज़िस्टेंस फ्रंट (टीआरएफ) का हाथ है। टीआरएफ ने खुद घोषणा कर दी थी कि हमने यह कांड किया है। टीआरएफ ने शनिवार 26 अप्रैल को अपनी संलिप्तता से इनकार किया, और कहा कि उनके सोशल मीडिया हैंडल को हैक कर लिया गया था।

टीआरएफ के प्रवक्ता ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर किए गए एक कथित दावे में कहा, हम पहलगाम की घटना में किसी भी तरह की संलिप्तता से साफ इनकार करते हैं। इस कृत्य के लिए टीआरएफ को जिम्मेदार ठहराना गलत, जल्दबाजी में किया गया और कश्मीरी प्रतिरोध को बदनाम करने के लिए एक सुनियोजित अभियान का हिस्सा है। उसके पहले उसकी ओर से दावा किया गया था कि गैर-स्थानीय लोगों को निवास प्रमाण पत्र जारी करने की प्रतिक्रिया में नागरिक हत्याओं के पीछे हमारा हाथ है। टीआरएफ ने कहा, पहलगाम में हमले के तुरंत बाद, हमारे एक डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म से एक संक्षिप्त और अनधिकृत संदेश पोस्ट किया गया था। आंतरिक ऑडिट के बाद, पता लगा कि यह एक समन्वित साइबर घुसपैठ का परिणाम था, जो भारतीय राष्ट्र-राज्य के डिजिटल युद्ध शस्त्रागार में एक परिचित रणनीति है।

उल्टा चोर…

पहलगाम हमले के बाद राजनयिक अलगाव और दबाव का सामना कर रहे पाकिस्तान के रक्षामंत्री ख्वाजा आसिफ ने 24 अप्रेल को अल जज़ीरा चैनल से कहा कि यह हमला भारत का ‘फॉल्स फ्लैग ऑपरेशन’ है। उसके एक दिन पहले वे अपने ही देश के एक चैनल से कह चुके थे कि यह भारत के भीतर पैदा हो रही बगावत का हिस्सा है। 25 अप्रेल को संरा सुरक्षा परिषद ने पहलगाम हमले की निंदा करते हुए एक बयान जारी किया, जिससे भारतीय विशेषज्ञ संतुष्ट नहीं थे।

बयान में सुरक्षा परिषद ने पहलगाम के आतंकवादी हमले की ‘कड़े शब्दों में’ निंदा ज़रूर की है, पर उसमें कुछ महत्वपूर्ण बातों की अनदेखी की गई। परिषद ने द रेज़िस्टेंस फ्रंट (टीआरएफ) का नाम नहीं लिया, जिसने हमले की जिम्मेदारी ली थी, और लश्कर-ए-तैयबा के साथ उसके संबंधों का उल्लेख भी नहीं किया, जो संरा द्वारा नामित आतंकवादी संगठन है। उसने भारत सरकार के साथ सहयोग की बात भी नहीं की, जैसा कि अतीत में होता रहा है। गैर-मुसलमानों को निशाना बनाए जाने का उल्लेख भी नहीं।

इस बयान के बाद पाकिस्तानी अखबारों ने इसे पाकिस्तानी डिप्लोमेसी की भारी जीत बताया था। स्पष्ट है कि इसे तैयार करने में पाकिस्तान और चीन का हाथ था। पाकिस्तान इन दिनों सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य भी है। अलबत्ता इसी बयान में पाकिस्तानी रणनीति की पोल भी छिपी है। क्या वजह थी कि सुरक्षा परिषद को टीआरएफ का नाम भी नहीं सूझा, जबकि उस समय तक उसका नाम ही सामने था?

टीआरएफ ने हाथ खींचा

टीआरएफ ने अपना हाथ पाकिस्तानी प्रधानमंत्री का बयान आने के बाद खींचा, जब शहबाज शरीफ ने 26 अप्रेल को अपनी पहली प्रतिक्रिया में कहा कि पाकिस्तान हमले की ‘किसी भी तटस्थ, पारदर्शी और विश्वसनीय जाँच के लिए तैयार है।’ यह बात तब कही गई, जब भारत ने हमले के ‘सीमा पार’ संबंधों को रेखांकित किया। ध्यान देने वाली बात है कि इस बयान के बाद ही टीआरएफ ने अपनी संलिप्तता वाले बयान को भी फर्ज़ी करार दिया। यकीनन ऐसा केवल शहबाज़ शहबाज शरीफ के बयान की वजह से नहीं किया गया होगा, बल्कि आईएसआई ने सीधा निर्देश दिया होगा।

शरीफ ने खैबर-पख्तूनख्वा के काकुल में पाकिस्तान मिलिट्री अकादमी में सेना के कैडेटों की पासिंग-आउट परेड को संबोधित करते हुए कहा: पहलगाम में हुई हालिया त्रासदी इस निरंतर दोषारोपण के खेल का एक और उदाहरण है जिसे पूरी तरह से बंद किया जाना चाहिए। और अब एक जिम्मेदार देश के रूप में अपनी भूमिका निभाते हुए, पाकिस्तान किसी भी तटस्थ, पारदर्शी और विश्वसनीय जांच में भाग लेने के लिए तैयार है। इस कार्यक्रम में वरिष्ठ फौजी अफसरों ने भी भाग लिया था और शरीफ को पहले से तैयार पाठ से पढ़ते हुए देखा गया, जो इस बात का संकेत था कि यह भाषण पाकिस्तानी ‘डीप स्टेट’ ने जाँचा और क्लियर किया होगा।

पाकिस्तान ढोंग

यह पहली बार नहीं है जब पाकिस्तान ने जाँच में शामिल होने की पेशकश की है। दरअसल, यह एक ऐसा तरीका है जिसका उद्देश्य लोगों की भावनाओं को ठेस पहुँचाना और फिर मसले से अपने हाथ धोना है। मुंबई में 2008 में हुए  हमलों के बाद, जिसमें 166 लोग मारे गए थे, पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने जाँच में भारत के साथ सहयोग करने की पेशकश की थी। जनवरी 2016 में पठानकोट आतंकी हमले के बाद, जिसमें आठ सैन्यकर्मी और चार आतंकवादी मारे गए थे, पाकिस्तान ने फिर से ऐसा कहा।

पाकिस्तान के जाँचकर्ताओं और अधिकारियों की एक टीम ने पठानकोट एयरबेस का दौरा भी किया। सितम्बर 2016 में उड़ी के हमले के बाद भी, जिसमें 19 सैन्यकर्मी मारे गए थे, पाकिस्तान ने संयुक्त जाँच का सुझाव दिया था। 2019 में पुलवामा आतंकी हमले के बाद जिसमें 40 सीआरपीएफ जवान मारे गए थे, पाकिस्तान के पूर्व पीएम इमरान खान ने दावा किया था कि अगर भारत, कार्रवाई योग्य खुफिया जानकारी प्रदान करेगा, तो पाकिस्तान भारतीय जाँच में सहयोग करने के लिए तैयार है।

सुरक्षा परिषद में

भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने टीआरएफ और प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के संबंधों को लेकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद 1267 प्रतिबंध समिति को टीआरएफ और लश्कर-ए-तैयबा के बीच संबंधों के पुख्ता सबूत भी मुहैया कराए हैं। भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने डिजिटल हस्ताक्षर, वित्तीय सुराग और भौतिक कनेक्शन मुहैया कराए, जो टीआरएफ और संयुक्त राष्ट्र द्वारा नामित आतंकवादी संगठन के बीच स्थापित संबंध को दर्शाते हैं। भारत चाहता है कि आरएफ को संयुक्त राष्ट्र, आतंकवादी संगठन घोषित करे।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने पहले कहा था: टीआरएफ एक ऐसा संगठन है जो लश्कर-ए-तैयबा का मुखौटा है और 2023-24 से हम सुरक्षा परिषद में टीआरएफ को सूचीबद्ध करने का प्रयास कर रहे हैं। भारत ने इससे पहले मई और नवंबर 2024 में 1267 समिति की निगरानी टीम को अपनी अर्ध-वार्षिक प्रस्तुतियों में टीआरएफ के संबंध में जानकारी प्रदान की थी।

2019 में बना

टीआरएफ, जम्मू-कश्मीर में सक्रिय है और वह 2019 में अस्तित्व में आया। इसकी पृष्ठभूमि निम्नलिखित बिंदुओं में समझी जा सकती है:

उदय और उद्देश्य: इसका गठन अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद हुआ। यह संगठन लश्कर-ए-तैयबा का मुखौटा संगठन माना जाता है, जिसे पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई और लश्कर-ए-तैयबा ने मिलकर बनाया। इसका मुख्य उद्देश्य कश्मीर में आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा देना, गैर-कश्मीरी लोगों को निशाना बनाना, और क्षेत्र में अस्थिरता पैदा करना है, ताकि बाहरी लोग जम्मू-कश्मीर आने से डरें।

इसका नेतृत्व शेख सज्जाद गुल, सलीम रहमानी, और साजिद जट जैसे आतंकियों के हाथ में रहा है, जो पाकिस्तान से संचालित होते हैं। सज्जाद गुल को भारत ने गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत आतंकी घोषित किया है। संगठन का एक प्रमुख कमांडर सैफुल्ला कश्मीरी भी लश्कर-ए-तैयबा के साथ जुड़ा है। टीआरएफ खुद को कश्मीरी स्वतंत्रता के लिए लड़ने वाला संगठन दिखाने की कोशिश करता है और गैर-धार्मिक छवि बनाता है, ताकि यह अल-कायदा या जैश-ए-मुहम्मद जैसे संगठनों से अलग दिखे। हालांकि, भारतीय अधिकारियों का कहना है कि यह लश्कर-ए-तैयबा का ही हिस्सा है।

टारगेट किलिंग

टीआरएफ मुख्य रूप से टारगेट किलिंग पर ध्यान देता है, खासकर कश्मीरी पंडितों, सिखों, गैर-कश्मीरी मजदूरों, और सुरक्षाबलों को निशाना बनाता है। यह संगठन सोशल मीडिया (टेलीग्राम, व्हाट्सएप) के जरिए प्रचार, भर्ती, और धमकियाँ देने में सक्रिय है। इसके अलावा, यह हथियारों और नशीले पदार्थों की तस्करी में भी शामिल है। टीआरएफ ने कई बड़े हमलों की जिम्मेदारी ली, जैसे 2025 में पहलगाम हमला, 2023 में अनंतनाग मुठभेड़, और 2024 में गांदरबल हमला। यह संगठन स्थानीय युवाओं को भर्ती करता है, जिन्हें पाकिस्तान में प्रशिक्षण दिया जाता है।

इस संगठन ने 7 अक्तूबर, 2021 को बयान जारी करके श्रीनगर के संगम, ईदगाह में गवर्नमेंट बॉयज हायर सेकेंडरी स्कूल के स्कूल शिक्षकों की हत्या की जिम्मेदारी ली। उन्होंने स्कूल में प्रिंसिपल सतिंदर कौर और शिक्षक दीपक चंद को नजदीक से गोली मार दी थी। आतंकियों के बयान में कहा गया, शहीद गाजी दस्ते (टीआरएफ) ने आज श्रीनगर में निशाना बनाकर हमला किया। इसमें आगे दावा किया गया कि शिक्षकों को इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि उन्होंने छात्रों से स्कूल में आयोजित 15 अगस्त के स्वतंत्रता दिवस समारोह में शामिल होने का आग्रह किया था। इसे ‘गंदा समारोह’ बताते हुए, Fm संगठन ने कहा कि उनकी चेतावनी और धमकी के बावजूद, इन शिक्षकों ने संरक्षकों को परेशान किया और चेतावनी दी कि अगर कोई छात्र उनके स्कूल में 15 अगस्त को आयोजित गंदे समारोह में शामिल नहीं हुआ तो उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।

भारत सरकार ने 2023 में टीआरएफ को यूएपीए के तहत आतंकी संगठन घोषित कर दिया था। सुरक्षा बलों ने इसके कई आतंकियों को मार गिराया, जिसमें 2022 में 108 टीआरएफ या लश्कर से जुड़े आतंकी शामिल थे।

निष्कर्ष: टीआरएफ एक पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठन है, जो लश्कर-ए-तैयबा की छाया में काम करता है। इसका गठन कश्मीर में आतंकवाद को नया चेहरा देने और पाकिस्तान की संलिप्तता को छिपाने के लिए किया गया। यह संगठन जम्मू-कश्मीर में शांति और पर्यटन को नुकसान पहुँचाने के लिए टारगेट किलिंग और अन्य आतंकी गतिविधियों में सक्रिय है।

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