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तैयार हैं स्वदेशी एके-203 राइफलें

मध्य प्रदेश के जबलपुर में ग्रेनेडियर्स रेजिमेंटल सेंटर सेना के जवानों को देश में ही बनी एके-203 राइफलों को चलाने का प्रशिक्षण दे रहा है। भारत-रूसी तकनीक पर आधारित इस राइफल को भारत में बनाया गया है। भारतीय सेना का यह पहला 15 सदस्य इनफेंट्री रेजिमेंटल सेंटर बैच है जिसे इस राइफल की ट्रेनिंग दी गई है। प्रशिक्षण के बाद प्रशिक्षित जवान सेना और अन्य सुरक्षा एजेंसियों के जवानों को अत्याधुनिक राइफल चलाने का प्रशिक्षण देंगे। एके-203 राइफल को पिछली दो राइफलों एके-47 और इनसास की तुलना में ज्यादा प्रभावी माना जा रहा है। मारक क्षमता में यह उनसे आगे है और दोनों से वजन में कम है।

इनसास बिना मैगजीन और बेनेट के भी 4.15 किलो की है, जबकि एके-203 का पूरा वजन 4.1 किलोग्राम है। किसी भी ऑपरेशन में सेना के जवानों को एके-203 को संभालना और इस्तेमाल करना आसान होगा। यह रात के ऑपरेशन में भी बहुत प्रभावी होगी। वजन और लंबाई कम होने पर राइफल को लंबे समय तक उठाया जा सकता है। राइफल को सिर्फ आठ से नौ पार्ट्स को मिलाकर बनाया जाएगा, जिसके कारण इसका संचालन भी आसान होगा।

7.62X39 मिमी की एके-203 को दो तरीकों से फायर किया जा सकता है। एक है सेमी-ऑटोमेटिक और दूसरा पूर्ण-ऑटोमेटिक। यह दो साइजों में आती है। एक, फुल साइज़ और दूसरी कॉम्पैक्ट/कार्बाइन। फुल साइज़ राइफल की लंबाई 940 मिमी है और इसके स्टॉक को फोल्ड करने के बाद 705 मिमी। इसके बैरल की लंबाई 415 मिमी है और खाली वजन 4.1 किलोग्राम है। अंडर बैरल ग्रेनेड लॉन्चर और बेनेट भी हैं। इसकी मैगज़ीन में 30 गोलियाँ आती हैं। यह करीब 800 मीटर दूर तक लक्ष्य पर सटीक निशाना लगा सकती है। यह एक मिनट में 600 राउंड तक फायर कर सकती है। इसका मतलब है कि इनसास राइफल की तुलना में यह प्रति मिनट 50 राउंड ज्यादा फायर करती है।

इसके हल्के वजन को देखते हुए, इस राइफल से उन सैनिकों पर बोझ कम होने की भी उम्मीद है, जिन्हें पूरे दिन बंदूक को अपने कंधों पर लटकाए रखना पड़ता है। कम वजन और अच्छी मारक क्षमता के कारण सैन्य हथियारों में अब तक एके-47 का दबदबा रहा है। एके-203 कलाश्निकोव सीरीज की सबसे एडवांस असॉल्ट राइफल है। इसे बना रही कंपनी का नाम है इंडो-रशा राइफल्स प्राइवेट लिमिटेड (आईआरआरपीएल)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 3 मार्च 2019 को इस निर्माण योजना का औपचारिक उद्घाटन अमेठी स्थित कोरवा ऑर्डिनेंस फैक्टरी में जाकर किया था।

एके-203 के आने से एके-47 का वर्चस्व भी खत्म हो जाएगा। इसका संचालन आसान है और कम समय में चलाने के लिए इसे तैयार किया जा सकता है। पूरी तरह से भारत में निर्मित होने के कारण यह राइफल सरकार के लिए आर्थिक रूप से फायदेमंद साबित होगी और केंद्र की ‘मेक इन इंडिया’ पहल को बड़ा बढ़ावा देगी। रेगुलर ऑपरेशन के लिए इसे जल्द ही भारतीय सेना को सौंप दिया जाएगा। उत्तर प्रदेश के अमेठी के कोरवा स्थित कारखाने में कुल मिलाकर 6.01 लाख असॉल्ट राइफलों का उत्पादन किया जा रहा है। कलाश्निकोव ने पूरी तरह रूस में बनी 70,000 राइफलें पहले बैच में दी हैं। इसके बाद भारत में बनी पहली 70,000 राइफलों में 70 प्रतिशत सामग्री स्वदेशी होगी। उसके बाद के बैचों में बनने वाली राइफलों में शत-प्रतिशत स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल किया जाएगा।

मार्च, 2023 में रक्षा राज्यमंत्री अजय भट्ट ने राज्यसभा में एक लिखित उत्तर में बताया कि इंडो-रशन राइफल्स प्राइवेट लिमिटेड ने उत्पादन से जुड़ी सभी सुविधाओं को स्थापित कर लिया है और इन राइफलों का उत्पादन और परीक्षण चल रहा है। इसके बाद नवंबर में भारतीय मीडिया में इस आशय की खबरें भी प्रकाशित हुईं कि यूक्रेन युद्ध के कारण एके-203 के उत्पादन में विलंब हो रहा है।

गत 24 अप्रेल को उप-सेनाध्यक्ष ले. जनरल उपेन्द्र द्विवेदी ने कोरवा में राइफल फैक्ट्री का निरीक्षण किया और कारखाने में बनी राइफलों को देखा।

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