उभरते वैश्विक भू राजनीतिक परिदृश्य तथा नवीन शक्ति युद्ध की ओर बढ़ती दुनिया को इस दौर में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय मामलों और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों की दृष्टि से मोदी की यह यात्रा बेहद अहम कही जा सकती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अनवरत तीसरी बार सरकार का नेतृत्व संभालते ही पहली द्विपक्षीय विदेश यात्रा रूस में करके स्पष्ट कर दिया कि वर्तमान वैश्विक स्थिति में भारत के लिए रूस के साथ मैत्री कितने महत्वपूर्ण है। भारत-रूस निकटता के कारण चीन और अमेरिका की चिन्ता और चुनौतियां स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है। चूंकि भारत व रूस के बीच विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त सामरिक साझेदारी के निरन्तर सुदृढ़ एवं गहन होने पर बल दिया गया है। दोनों देशों के रणनीतिक साझेदारी के एक महत्वपूर्ण आधार स्तम्भ के रूप में ऊर्जा क्षेत्र में मजबूत और व्यापक सहयोग के महत्व को दोहराया है। इस सन्दर्भ में दोनों पक्षों ने ऊर्जा संसाधनों में द्विपक्षीय व्यापार के निरन्तर विशेष महत्व को नोट किया और नए दीर्घकालिक अनुबंधों को तलाश करने पर सहमति व्यक्त की।
वास्तव में ऊर्जा भारत व रूस के बीच सहयोग, समर्थन एवं सहानुभूति का महत्वपूर्ण स्तम्भ है और इस क्षेत्र के सम्बन्धों को प्रगाढ़ बनाने के लिए दोनों देशों के अपने हित भी समाहित है। प्रधानमन्त्री मोदी और राष्ट्रपति पुतिन के साथ 22वीं भारत रुस वार्षिक शिखर वार्ता जुलाई 2024 में संपन्न हुई। इस अवसर पर विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भविष्य की संभावनाओं को दृष्टिगत रखते हुए आपसी सहयोग पर विचार किया, जिसका उपयोग भविष्य की पीढ़ियों द्वारा धरती के लाभ के लिए बेहतर रूप से किया जा सकता है।
भारत के प्रधानमंत्री की यह यात्रा जटिल भू-राजनीतिक स्थितियों के बीच निरन्तर आगे अग्रसर होने और विरोधों के बावजूद प्रमुख शक्तियों के साथ मजबूत साझेदारी बनाये रखने की भारत की दक्षता एवं कार्यकुशलता का स्पष्ट आभास कराती है। पश्चिमी देशों के निरंतर दबाव के बावजूद भारत-रूस की सामरिक साझेदारी सक्रियता के साथ आगे बढ़ती जा रही है। इसे भारत की कुशल बहु-गठबंधन अथवा बहु-संरेखण कूटयोजना (मल्टी एलाइनमेंट स्ट्रैटजी) की निपुणता भी कहा जा रहा है। परस्पर विरोधी हितों में संतुलन बनाना भारत की एक बड़ी राजनयिक परीक्षा भी माना गया है।

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस में भारतीय समुदाय को सम्बंधित करते हुए स्पष्ट रूप से कहा कि भारत-रूस सम्बन्ध आपसी विश्वास और सम्मान के मजबूत स्तम्भ पर बने है। दोनों देशों के सम्बन्धों की बार- बार परीक्षा हुई और हर बार वे और अधिक मजबूत हुए। उन्होंने कहा कि भारत को उभरती हुई बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में एक सशक्त एवं सुदृढ़ स्तम्भ के रूप में देखा जा रहा है। जब भारत शान्ति, सुरक्षा, संवाद एवं कूटनीति की बात करता है तो पूरी दुनिया सुनती है। रुस शब्द सुनते ही प्रत्येक भारतीय के दिल और दिमाग में भारत के सुख-दुख के साथी और एक भरोसेमन्द सहयोगी देश के रूप में आता है। दशकों से भारतीय दोनों देशों के बीच अद्वितीय साझेदारी के प्रशंसक रहे हैं। रूस में सदियों में तापमान चाहे कितना भी कम क्यों न हो जाए, भारत-रूस की मित्रता हमेशा प्लस में और गर्मजोशी से भरी रही है। यह रिश्ता आपसी विश्वास, आस्था और आपसी सम्मान की मजबूत नींव पर बना है।
प्रधानमंत्री मोदी के रूस दौरे से जहाँ चीन अपनी लंबी साँसें लेने लगता है वहाँ अमेरिका की बेचैनी भी बहुत हद तक बढ़ जाती है। भारत के साथ उस की निकटता चीन के सभी सामरिक एवं कूटनीतिक समीकरणों को तहस-नहस कर देती है तथा अमेरिका को भी अपने वर्चस्व की शक्ति क्षीण होती नजर आती है। इस दो दिवसीय मोदी की रूस यात्रा को लेकर अमेरिका की नाराजगी खुलकर आखिरकार सामने आ गयी। नई दिल्ली में अमेरिकी राजदूत एरिक गार्सेटी ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में परोक्ष रूप से मोदी की रूस यात्रा को लेकर काफी तल्खी भरी बाते कही- मैं भारत की रणनीतिक स्वायत्तता का आदर करता है, किन्तु युद्ध के समय कोई रणनीतिक स्वायत्तता नहीं होती। अभी सिर्फ शान्ति बहाली की बात करने का वक्त नहीं है, बल्कि उन्हें दण्ड भी दिलाना होगा। भारत को सामूहिक साझेदारी के तौर पर अमेरिका तथा रूस में से किसी एक का चयन करना होगा। इसके साथ यह भी याद दिलाया कि आज सबसे बेहतरीन रक्षा उपकरण अमेरिका ही बना रहा है और वह इन हथियारों को भारत के साथ साझा करने को भी तैयार है।
भारत-रूस रणनीतिक सम्बन्धों को लेकर पश्चिमी देशों मे इसकी आलोचना की एक लंबी झड़ी भी लगा दी। अमेरिकी राजदूत एरिक गार्सेटी ने रूस के यूक्रेन पर हमले की तुलना चीन की तरफ से भारत के पूर्वी लद्दाख इलाके में किए गए हमले से करते हुए कहा कि आज भी युद्ध बहुत दूर नहीं होता। दुनिया उन देशों की ओर देख रही है जो दूसरे देशों की संप्रभुता का उल्लंघन करते हैं। हमें भारत को यह याद दिलाने की आवश्यकता नहीं है कि सीमा कितनी महत्वपूर्ण होती है? हमें इन सिद्धांतों पर एक साथ रहना चाहिए। यह बात उन्होंने दिल्ली के एक थिंक टैंक के कार्यक्रम के दौरान अपने भाषण में कही और अनेक बार मोदी के रूस दौरे का जिक्र किया।
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने देश का सर्वोच्च सम्मान व अत्यन्त प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान ‘द ऑर्डर ऑफ सेंट एंड्रयू द अपोसल’ से आधिकारिक रूप से सम्मानित किया।
हाल ही में आयोजित 22वें भारत रुस वार्षिक शिखर सम्मेलन में आखिरकार भारत को इस दौरे से क्या मिला?
- द्विपक्षीय व्यापार बढ़ोतरी- दोनों देशों में 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार में वृद्धि करके 100 अरब डॉलर तक करने पर सहमति।
- रूस के कजान और येकातोदिनबर्ग में दो नए वाणिज्य दूतावास खोलने की घोषणा
- रुसी रक्षा उपकरणों के लिए आवश्यक कलपुर्जों का निर्माण भारत में ही होगा और संयुक्त उपक्रम स्थापित होगा।
- रूस भारत के साथ 6 और परमाणु ऊर्जा इकाइयों के निर्माण पर बातचीत कर रहा है।
- नए संपर्क मार्ग के रूप में भारत और रूस ने चेन्नई-व्लादीवोस्तक समुद्र मार्ग, उत्तरी समुद्री मार्ग और ईरान के माध्यम से अन्तरराष्ट्रीय उत्तर दक्षिण परिवहन गलियारे जैसे नए संपर्क मार्गों को पूरा करने पर सहमति बनी।
- व्यापार, जलवायु परिवर्तन और शोध जैसे क्षेत्रों में नौ समझौतों पर हस्ताक्षर।
- भारत व रूस की सेनाओं के बीच तकनीकी सहयोग पर गठित समिति की बैठक पुनः प्रारंभ।
- भारत को लंबी अवधि के लिए कच्चे तेल, कोयला एवं उर्वरक खाद आपूर्ति करने के लिए रूस तैयार है।
- कुडनकुलम के अतिरिक्त एक और जगह उसकी तकनीक पर आधारित परमाणु ऊर्जा संयंत्र स्थापित किया जायेगा।
- अपनी मुद्राओं में कारोबार को सेटल की व्यवस्था होगी जिसके तहत कृषि खाद्य के थोक में व्यापार वृद्धि की तैयारी।
- आपसी व्यापार की वृद्धि हेतु गैर शुल्क बाधाओं को समाप्त करेंगे। यूरोपीय देशों के साथ मुक्त व्यापार संधि (एफटीए) पर आपसी परिचर्चा।
दूसरी ओर रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने ओर कहा कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों को आगे बढाने वाली एक महान शक्ति है और मॉस्को के साथ उसके सम्बन्धों को लेकर उस पर पूरी तरह से अनुचित दबाव बनाया जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा- ‘भारत एक महान शक्ति है, अपने राष्ट्रीय हितों को वह स्वयं सुनिश्चित करता है, अपने सहयोगी मित्र स्वयं चुनता है और हम जानते है कि भारत पर पूरी तरह से अनुचित व अप्रत्यक्ष प्रभाव बनाने का प्रयास हो रहा है’। मोदी की मॉस्को चाबा के सन्दर्भ में यूक्रेन के राष्ट्रपति व्लादिमीर ज़ेलेंस्की की टिप्पणी को बहुत अपमानजनक बताया और यूक्रेन के नई दिल्ली स्थित राजदूत अलेक्सांद्र पोलिशचुक को बुलाकर टिप्पणी पर विरोध व्यक्त किया।
ज़ेलेंस्की द्वारा एक्स पर पोस्ट किया गया था- “यह शांति प्रयासों के लिए बड़ा झटका है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के नेता ने मॉस्को में संसार के सबसे खूनी अपराधी को ऐसे दिन गले लगाया जब कीव में बच्चों के अस्पताल पर कसी प्रक्षेपास्त्र से प्रहार किया गया था।” चूंकि अमेरिका की अगुवाई वाले नेटो के सदस्य देश रूस-यूक्रेन के बीच जारी संघर्ष में अनवरत आवश्यक हथियार व अन्य आवश्यक सामग्री की आपूर्ति करके युद्ध की ज्वाला को निरंतर भड़का रहे हैं। उनका कहना है कि रूस युद्ध का समर्थक है और यूक्रेन पर हमले की पहल भी उसी के द्वारा की गयी है, उनके द्वारा यह प्रचार व प्रसार किया जा रहा है कि रूस-यूक्रेन युद्ध के लिए केवल रूस प्रमुख रूप से दोषी है तथा रूस यूरोपीय सहित सम्पूर्ण विश्व की सुरक्षा के लिए निरन्तर एक बाद संकट खड़ा कर रहा है। वास्तव में इस युद्ध ने भारत के लिए बड़ी व कड़ी चुनौती पेश की है। भारत रूस और पश्चिमी देशों के बीच संतुलन बना रहा है।
भारत-रूस सम्बन्धों की यदि सही रूप में समीक्षा की जाये तो वास्तविकता यह है कि इसको जितना बढ़ा-चढ़ाकर वर्णित किया जाता है, व्यावहारिक रूप से उससे कहीं कम ही है। इस समय अनवरत कमजोर होता रूस चीन पर अपनी निर्भरता बढ़ा रहा। दूसरी ओर अमेरिका के पास अपने वर्चस्व को बनाए रखने के किए भारत के साथ मित्रता बनाये रखना एक बडा विकल्प है। इसके साथ चीन की चुनौतियों एवं चिंताओं को मद्देनज़र रखते हुए भारत को रूस एवं अमेरिका के साथ सम्बन्धों का संतुलन बनाये रखने के लिए एक बार फिर अपनी कूटनीतिक परीक्षा के दौर से गुजरना होगा। मास्कों को बीजिंग पर निर्भरता कम करने के लिए भारत के साथ मित्रता एक यहां हिस्सा है। दूसरी ओर चीन की निगाहों एवं विस्तारवादी नीतियों पर लगाम लगाने के लिए रूस-भारत साझेदारी सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। अमेरिका का स्पष्ट कहना है कि रूस के सम्बन्धों में चिन्ताओं के बावजूद भारत रणनीतिक साझेदार बना रहेगा। बदलते समीकरण में सजगता व सतर्कता बेहद जरूरी है।
पेंटागन का कहना है कि हमें भरोसा है कि भारत यूक्रेन में शान्ति का समर्थन करेगा। प्रधानमंत्री मोदी ने पूरी दुनिया को युद्ध व शांति के संदर्भ में भारतीय दर्शन से अवगत कराते हुए कहा कि युद्ध के मैदान से किसी तरह का समाधान नहीं निकलता। यह युद्ध का समय नहीं, मासूमों की मौत स्वीकार नहीं। भारत ने दुनिया को बुद्ध दिये है, युद्ध नहीं। पेंटागन के प्रेस सचिव मेजर जनरल पैट राइडर ने कहा कि भारत के रूस के साथ रिश्तों पर हम हमेशा से साफ तौर पर बात करते रहे है। उन्होंने यह भी उम्मीद जताई कि भारत यूक्रेन में स्थायी शान्ति लाने में मदद कर सकता है। रूस से भारत यही चाहता है कि चीन के साथ प्रतिस्पर्धा में वह उसका खुलकर साथ दे और भारत से रूस यह अपेक्षा कर रहा है कि पश्चिम से मुकाबला में हमारी मदद करे।