प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जुलाई के पहले सप्ताह में इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड की यात्रा पर जाकर भारत की ‘एक्ट-ईस्ट पॉलिसी’ में ऊर्जा का संचार कर दिया। हिंद-प्रशांत क्षेत्र की हाल की परिघटनाओं और अमेरिकी नीति में आ रहे बदलाव को देखते हुए यह यात्रा बेहद महत्त्वपूर्ण मानी जा रही है। प्रधानमंत्री अपनी यात्रा के पहले चरण में इंडोनेशिया गए, जहाँ उन्होंने भारत और इंडोनेशिया के समुद्री सहयोग पर व्यापक चर्चा की। इस दौरान विदेश मंत्रालय ने भारत की ग्रेट निकोबार द्वीप पहल और इंडोनेशिया के सबांग बंदरगाह जैसी रणनीतिक परियोजनाओं पर विशेष ध्यान दिया।
ये वार्ताएं रक्षा, सुरक्षा और आर्थिक क्षेत्रों में द्विपक्षीय संबंधों को गहरा करने के व्यापक एजेंडे का हिस्सा थीं। विदेश मंत्रालय में सचिव (पूर्वी) रुद्रेंद्र टंडन ने शिखर सम्मेलन के बाद मीडिया को जानकारी देते हुए बताया कि प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो के बीच हुई बातचीत में समुद्री सहयोग केंद्रीय विषय था। उन्होंने याद दिलाया कि पीएम मोदी की 2018 की यात्रा के दौरान, दोनों देशों ने एक साझा समुद्री दृष्टिकोण का अनावरण किया था, और हालिया चर्चाओं का उद्देश्य उस कार्यक्रम को आगे बढ़ाना है। वार्ता में आपसी समुद्री क्षेत्र जागरूकता, संपर्क और दोनों देशों के तटरक्षक बलों के बीच सहयोग बढ़ाने जैसे विषय शामिल थे।
इस यात्रा की एक महत्त्वपूर्ण परिणाम यह रहा कि इंडोनेशिया ने भारत के गुरुग्राम स्थित सूचना संलयन केंद्र-हिंद महासागर क्षेत्र में एक संपर्क अधिकारी तैनात करने का निर्णय लिया। इस कदम से समुद्री सुरक्षा समन्वय को मजबूती मिलने की उम्मीद है। टंडन ने दोनों देशों की भौगोलिक निकटता पर जोर देते हुए बताया कि उनकी राजधानियों के बीच की दूरी के बावजूद, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में स्थित उनके द्वीप और इंडोनेशिया केवल 150 किलोमीटर की दूरी पर हैं, जो उन्हें स्वाभाविक रूप से समुद्री पड़ोसी बनाता है।
दोनों पक्षों ने रणनीतिक अवसंरचना परियोजनाओं में रुचि व्यक्त की, जिसमें इंडोनेशिया ने भारत की ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना में गहरी दिलचस्पी दिखाई, वहीं भारत ने सबांग बंदरगाह के विकास में सहयोग देकर इसका प्रतिफल दिया। साझा समुद्री दृष्टिकोण को लागू करने के लिए 2018 में गठित संयुक्त कार्य बल की दो बैठकें हो चुकी हैं और तीसरी बैठक इसी वर्ष के अंत में होने की उम्मीद है। दोनों देशों के तटरक्षक बलों के बीच सहयोग को नवीनीकृत करने के लिए एक समझौता ज्ञापन पर भी हस्ताक्षर किए गए।
छह क्षेत्रों में भागीदारी
नेताओं ने रक्षा क्षेत्र से शुरू करते हुए छह प्रमुख क्षेत्रों में व्यापक रणनीतिक साझेदारी को आगे बढ़ाने पर चर्चा की। टंडन ने बताया कि मुख्य उद्देश्य सैन्य आदान-प्रदान से आगे बढ़कर रक्षा उद्योगों के बीच सहयोग स्थापित करना है। भारतीय रक्षा कंपनियां, जिन्होंने कई क्षेत्रों में तकनीकी परिपक्वता हासिल कर ली है, अब इंडोनेशियाई समकक्षों के साथ सहयोग के लिए रूपरेखा तलाश रही हैं। चर्चा में जहाजरानी, हथियार प्रणालियों और मिसाइल क्षेत्र में सहयोग जैसे विषयों पर भी बात हुई।
आर्थिक संबंधों की भी समीक्षा की गई और दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हुए कि वर्तमान द्विपक्षीय व्यापार की मात्रा 25 अरब अमेरिकी डॉलर है, जो उनकी अर्थव्यवस्थाओं के आकार को नहीं दर्शाती है। उन्होंने व्यापार विस्तार का लक्ष्य निर्धारित किया, विशेष रूप से फार्मास्युटिकल्स, खाद्य प्रसंस्करण, डिजिटल अवसंरचना और नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र के क्षेत्र में।
स्वास्थ्य सेवा सहयोग को प्राथमिकता दी गई है, क्योंकि भारत की “विश्व की औषधालय” के रूप में प्रतिष्ठा इंडोनेशिया की सस्ती और उच्च गुणवत्ता वाली दवाओं की आवश्यकता को पूरा करती है। इस सहयोग से इंडोनेशिया में भारतीय चिकित्सा उत्पादों की उपलब्धता बढ़ने की उम्मीद है।
शिक्षा और सांस्कृतिक संबंध भी चर्चा का एक प्रमुख क्षेत्र थे। प्रमुख भारतीय विश्वविद्यालयों द्वारा इंडोनेशिया में परिसर स्थापित करने के लिए समझौते हुए, जिससे शैक्षणिक और सभ्यतागत संबंधों को मजबूती मिली। नेताओं ने विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों के बीच सहयोग बढ़ाने पर भी चर्चा की।
भारतीय मिसाइल
इंडोनेशिया द्वारा राफेल विमानों की खरीद, और भारत के साथ हाल में हुए मिसाइल सौदों के एसयू-30 में संयोजन से अस्त्र, रुद्रम और ब्रह्मोस-एनजी जैसे स्वदेशी भारतीय हथियारों के निर्यात के लिए एक बड़ा अवसर खुल गया है। इंडोनेशिया द्वारा 42 राफेल विमानों का संचालन किए जाने के साथ, फ्रांसीसी लड़ाकू विमान में भारतीय प्रणालियों का एकीकरण एक नया ग्राहक आधार बना सकता है और भारत की रक्षा निर्यात महत्वाकांक्षाओं को मजबूत कर सकता है।
भारत अपने राफेल विमानों में ब्रह्मोस और अस्त्र मिसाइलों का एकीकरण चाहता है। यदि इंडोनेशिया के लिए भी फ्रांस इसी तरह की व्यवस्था पर सहमत हो जाता है, तो भारतीय मिसाइलों को जकार्ता के राफेल बेड़े में एकीकृत किया जा सकता है। इससे इंडोनेशिया की उन हथियारों तक पहुँच प्राप्त हो जाएगी जो फ्रांस उपलब्ध नहीं कराता, जैसे कि दुश्मन की हवाई सुरक्षा को निष्क्रिय करने वाली रुद्रम विकिरण-रोधी मिसाइल और हल्की तथा लड़ाकू विमानों द्वारा ले जाने के लिए अनुकूलित ब्रह्मोस-एनजी सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल।
भारत के लिए, यह एक रणनीतिक निर्यात अवसर है। राफेल का संचालन भारत, फ्रांस, मिस्र, कतर, ग्रीस और अब इंडोनेशिया सहित कई देशों द्वारा किया जाता है। यदि भारतीय हथियारों को सफलतापूर्वक एकीकृत किया जाता है, तो उन्हें अन्य राफेल संचालकों को एक पैकेज के रूप में बेचा जा सकता है, जिससे एक नया निर्यात तंत्र तैयार होगा। इस प्रकार, एस्ट्रा परिवार, रुद्रम श्रृंखला और ब्रह्मोस-एनजी को वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त लड़ाकू विमान मंच पर सिद्ध प्रणालियों के रूप में विश्वसनीयता प्राप्त होगी।
इंडोनेशिया का यह निर्णय रणनीतिक और व्यावसायिक दोनों ही पहलुओं को दर्शाता है। आपूर्तिकर्ताओं में विविधता लाकर, जकार्ता पारंपरिक साझेदारों पर अपनी निर्भरता कम करता है और प्रतिस्पर्धी लागतों पर उन्नत प्रणालियों तक पहुंच प्राप्त करता है।
रक्षा समझौते
इंडोनेशिया ने भारत के साथ अस्त्र मार्क-1 बियॉन्ड-विजुअल-रेंज एयर-टू-एयर मिसाइल और ब्रह्मोस तटीय रक्षा बैटरी की खरीद के लिए ऐतिहासिक समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन द्वारा विकसित अस्त्र का यह पहला अंतरराष्ट्रीय निर्यात है, और इसके साथ ही इंडोनेशिया फिलीपींस और वियतनाम के बाद ब्रह्मोस का तीसरा विदेशी ग्राहक बन गया है।
80-110 किमी की रेंज और मैक 4.5 की गति वाली अस्त्र एमके-1 को इंडोनेशिया के एसयू-30 बेड़े में एकीकृत किया जा रहा है, जबकि 200 किमी तक की रेंज वाली अस्त्र एमके-2 विकास के अधीन है। इन सौदों का मूल्य 8,000 से 10,000 करोड़ रुपये के बीच है और इनमें विनिर्माण, एकीकरण और कमांड-एंड-कंट्रोल सिस्टम के लिए भारत डायनैमिक्स लिमिटेड और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड भी शामिल हैं।
भारत के लिए, यह समझौता विश्व के सबसे बड़े हथियार आयातकों में से एक होने से लेकर उन्नत प्रणालियों के एक विश्वसनीय निर्यातक बनने की दिशा में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत है। मिसाइलों के अलावा, भारत-इंडोनेशिया साझेदारी में समुद्री सुरक्षा, महत्वपूर्ण खनिजों और बंदरगाह विकास पर सहयोग भी शामिल है। मलक्का जलडमरूमध्य के निकट स्थित सबांग बंदरगाह का संयुक्त विकास, भारत की ग्रेट निकोबार परियोजना के पूरक के रूप में, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उसकी रणनीतिक उपस्थिति को बढ़ाता है। यह समुद्री आयाम रक्षा सौदों के व्यापक भू-राजनीतिक महत्व को रेखांकित करता है।
भारत द्वारा इंडोनेशिया को अस्त्र मिसाइलों की संभावित बिक्री, एक बड़ा निर्यात बाजार खोल सकती है। ये मिसाइलें इंडोनेशिया के एसयू-30 बेड़े के लिए अपेक्षित हैं और फिलीपींस को ब्रह्मोस सौदों के साथ समान शर्तों पर पेश की जा सकती हैं। अस्त्र, पहले से ही भारत के सुखोई-30एमकेआई में एकीकृत हैं। इसे भारतीय वायुसेना रूसी एएएम मिसाइलों का स्थान लेने के लिए विकसित किया गया है। इसका विस्तारित-संस्करण डीआरडीओ द्वारा विकसित किया जा रहा है। अल्जीरिया, वियतनाम और मलेशिया जैसे अन्य एसयू-27/30 संचालकों के लिए यह मिसाइल आकर्षक हो सकती है जो रूसी मूल के प्लेटफार्मों को अपग्रेड करना चाहते हैं। इस शस्त्र-प्रणाली में रुचि रखने वाले कुछ अन्य देश दक्षिण कोरिया, अल्जीरिया, ग्रीस, मिस्र, वेनेजुएला, संयुक्त अरब अमीरात और चिली हैं।
भारत से ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल प्रणाली की एक अतिरिक्त बैटरी खरीदने के लिए इंडोनेशिया द्वारा सैद्धांतिक समझौते पर पहुंचने का निर्णय हिंद-प्रशांत क्षेत्र में नई दिल्ली की विस्तारित रक्षा कूटनीति में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि है। फिलीपींस के इस मिसाइल का पहला निर्यात ग्राहक बनने के बाद, और वियतनाम और मलेशिया जैसे देशों द्वारा भी इस प्रणाली का मूल्यांकन किए जाने के साथ, ब्रह्मोस भारत की बढ़ती रक्षा औद्योगिक क्षमताओं का प्रतीक बन गया है।
इस मिसाइल की खासियतें सिर्फ इसकी तकनीकी विशेषताओं तक ही सीमित नहीं हैं। यह दक्षिण-पूर्व एशिया में रणनीतिक आवश्यकताओं के तालमेल, भारत के एक प्रमुख रक्षा निर्यातक बनने के प्रयासों और हिंद-प्रशांत क्षेत्र की बदलती सुरक्षा संरचना को दर्शाती है।
सबांग बंदरगाह
प्रधानमंत्री मोदी की इंडोनेशिया यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम मलक्का जलडमरूमध्य के उत्तर-पश्चिमी प्रवेश द्वार के पास स्थित सबांग बंदरगाह को संयुक्त रूप से विकसित करने का निर्णय है। सबांग पर एक संयुक्त कार्य दल 2018 से ही मौजूद है, लेकिन नौकरशाही में देरी और वित्तपोषण संबंधी बाधाओं के कारण परियोजना शुरू नहीं हो पाई है। यह जलडमरूमध्य विश्व के सबसे व्यस्त चोक पॉइंट्स में से एक है, जहाँ से प्रतिदिन लगभग 2.3 करोड़ बैरल तेल का परिवहन होता है, जो लड़ाई से पहले होर्मुज जलडमरूमध्य से होने वाले 2.1 करोड़ बैरल तेल से ज्यादा है।
यह बंदरगाह रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि चीन के आयातित कच्चे तेल का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा इसी जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। सबांग बंदरगाह के विकास से भारत को चीन की बढ़ती नौसैनिक शक्ति का मुकाबला करने और हिंद महासागर में पनडुब्बियों और सतही जहाजों की गतिविधियों पर नजर रखने की क्षमता बढ़ाने में मदद मिलेगी।
इस क्षेत्र के कई देश दक्षिण चीन सागर में क्षेत्रीय दावों और बढ़ती सैन्य गतिविधियों का सामना कर रहे हैं। हालांकि अधिकांश देशों ने औपचारिक सैन्य गुटों में शामिल होने से परहेज किया है, लेकिन कई देशों ने संभावित दंडात्मक कार्रवाई की लागत को बढ़ाने वाली पहुँच-विरोधी और क्षेत्र-अस्वीकृति (ए2/एडी) क्षमताओं को हासिल करके प्रतिरोध को मजबूत करने की कोशिश की है।
विस्तृत तटरेखा वाली लेकिन अपेक्षाकृत सीमित नौसैनिक संसाधनों वाले मध्यम शक्तियों के लिए, लंबी दूरी की एंटी-शिप क्रूज मिसाइलें समुद्री रक्षा को मजबूत करने का एक कारगर साधन हैं। बड़ी नौसेनाओं से सीधे मुकाबला करने की कोशिश करने के बजाय, ये देश तटरेखा से सैकड़ों किलोमीटर दूर स्थित शत्रुतापूर्ण सतह युद्धपोतों को चुनौती देने में सक्षम भूमि-आधारित मिसाइल बैटरी तैनात कर सकते हैं। इसलिए ब्रह्मोस में रुचि, तेजी से प्रतिस्पर्धी होते इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में समुद्री क्षेत्र की जागरूकता, तटीय रक्षा और समुद्री नियंत्रण क्षमताओं को बेहतर बनाने के व्यापक क्षेत्रीय प्रयासों को दर्शाती है।
एक्ट-ईस्ट पॉलिसी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 11 जुलाई को ऑकलैंड से रवाना होते हुए इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के अपने तीन देशों के दौरे का समापन किया। यह एक ऐतिहासिक दौरा था जिसने इस इलाके के देशों के साथ भारत के संबंधों को दीर्घकालिक-साझेदारी के स्तर तक पहुँचाया। इस यात्रा के महत्व और प्रभाव को समझने के लिए हमें इन तीन देशों के अलावा दक्षिण, दक्षिण पूर्व और सुदूर एशिया के बारे में भी विचार करना होगा। यह दौरा हिंद-प्रशांत क्षेत्र के भू-राजनीतिक और आर्थिक भविष्य में भारत की उभरती आकांक्षाओं को उजागर करता है। इसलिए भी कि यह क्षेत्र वैश्विक-स्पर्धा का केंद्र बनता जा रहा है।
प्रधानमंत्री की यह यात्रा कोरिया और जापान के नेताओं के साथ उनकी हालिया मुलाकातों के बाद हुई हैं। ये सभी मुलाकातें भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी में नई ऊर्जा का संचार करती हैं और इस बात की मान्यता को दर्शाती हैं कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र की मध्यम शक्तियों के बीच गहरा सहयोग पारस्परिक आर्थिक और रणनीतिक लाभ संभव है। तीन देशों की इस यात्रा ने व्यापार, प्रौद्योगिकी, सुरक्षा, शिक्षा, नवाचार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण परिणाम दिए, जिससे हिंद-प्रशांत क्षेत्र और उससे परे एक प्रमुख भागीदार के रूप में भारत की भूमिका मजबूत हुई।
इंडोनेशिया के बाद ऑस्ट्रेलिया में, पीएम मोदी ने प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीज़ के साथ तीसरे ऑस्ट्रेलिया-भारत वार्षिक नेताओं के शिखर सम्मेलन में भाग लिया। इस शिखर सम्मेलन में रक्षा और सुरक्षा सहयोग पर एक संयुक्त घोषणापत्र जारी किया गया। दोनों देशों के बीच हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा और सैन्य अंतर-संचालनीयता के क्षेत्र में सहयोग का विस्तार किया गया और आईएईए सुरक्षा उपायों के तहत ऑस्ट्रेलिया से भारत को यूरेनियम के निर्यात की व्यवस्था को अंतिम रूप दिया गया। महत्वपूर्ण खनिजों, स्वच्छ ऊर्जा, व्यापार और निवेश के क्षेत्र में सहयोग का विस्तार भी किया गया।
अल्बानीज़ ने यह भी घोषणा की कि क्रिकेट की बिग बैश लीग 2026-27 का पहला सीज़न भारत में शुरू होगा, जिसका उद्घाटन मैच दिसंबर में चेन्नई में खेला जाएगा। यह ऑस्ट्रेलिया के बाहर खेला जाने वाला पहला बीबीएल मैच होगा।
प्रशांत क्षेत्र में न्यूज़ीलैंड एक महत्वपूर्ण साझेदार के रूप में उभर रहा है। ये सभी देश मिलकर उस इलाके में भारत की बढ़ती भागीदारी को उजागर करते हैं, जहाँ आर्थिक हित, समुद्री सुरक्षा और महाशक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा तेजी से बढ़ती जा रही है।
इन तीन देशों के अलावा हमें बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका, वियतनाम, थाईलैंड, मलेशिया, फिलीपींस, दक्षिण कोरिया और ताइवान के साथ भारत के रिश्तों पर भी नज़र डालनी होगी। चीन पर भी, जिसके साथ एक तरफ सामरिक-प्रतिस्पर्धा है, तो दूसरी तरफ आर्थिक-सहयोग।
भारतीय नीति
चीन जहाँ अपने ‘बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव(यानी बीआरआई)’ और ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ नीति के तहत बंदरगाहों, इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं और दीर्घकालीन निवेशों के माध्यम से अपनी उपस्थिति बढ़ा रहा है, वहीं भारत साझेदारी, समुद्री सहयोग और नियम-आधारित व्यवस्था पर ज़ोर देते हुए रिश्ते बना रहा है। दक्षिण चीन सागर और अरब सागर में चीन का बढ़ता नेटवर्क, इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश और रणनीतिक गठबंधनों के सहारे है। कई विश्लेषकों का मानना है कि विशाल चीनी नौसेना को समायोजित करने के लिए यह नेटवर्क और बढ़ेगा।
सच यह भी है कि अब दीर्घकालीन परिदृश्य में चीन से प्रतिस्पर्धा एकमात्र निर्णायक कारक नहीं है। भारत पिछले कुछ वर्षों से एक व्यापक हिंद-प्रशांत नीति विकसित कर रहा है, जो चीनी-नीतियों का विकल्प है।
साझेदारी और सहयोग
भारत ने हालाँकि अपने लिए विदेशी सैन्य ठिकानों की व्यवस्था भी की है, पर उसका ध्यान समग्र रूप से साझेदारियाँ कायम करने, समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने, रक्षा सहयोग बढ़ाने और एक विश्वसनीय क्षेत्रीय हितधारक के रूप में उभरने पर ज्यादा है। ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ शब्द का प्रयोग चीन की हिंद महासागर क्षेत्र में बंदरगाहों और समुद्री इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश को लेकर किया जा रहा है, जिसे कुछ विश्लेषक भारत को घेरने की रणनीति भी मानते हैं।
चीन का मुख्य लक्ष्य अपनी ऊर्जा आपूर्ति (व्यापार और तेल) की सुरक्षा सुनिश्चित करना और हिंद महासागर क्षेत्र में भारत के बढ़ते प्रभाव को रोकना भी है। इस रणनीति में प्रत्येक ‘मोती’ (पर्ल) एक रणनीतिक स्थान है, जैसे चीन द्वारा विकसित या नियंत्रित बंदरगाह और नौसैनिक अड्डे। भू-राजनीतिक अवधारणा के रूप में इस शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम 2005 में अमेरिकी रक्षा विभाग की आंतरिक रिपोर्ट ‘एशिया में ऊर्जा भविष्य’ में किया गया था।
चीनी इरादे
विश्लेषकों का कहना है कि ये व्यावसायिक पहलें अंततः चीन को सामरिक-योजनाओं के लिए रसद संबंधी सहायता प्रदान कर सकती हैं और चीन के व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के एक महत्वपूर्ण हिस्से के परिवहन के लिए समुद्री मार्गों को सुरक्षित करने में मदद कर सकती हैं। इनमें जिबूती में चीन का पहला विदेशी नौसेना अड्डा, पाकिस्तान में ग्वादर बंदरगाह, श्रीलंका में हंबनटोटा बंदरगाह और म्यांमार में क्यॉकप्यू बंदरगाह शामिल हैं। इनमें से ज्यादातर परियोजनाएं चीन की बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव (बीआरआई) से जुड़ी हैं।
चीन लगातार यह दावा कर रहा है कि ये निवेश पूरी तरह से व्यावसायिक हैं और क्षेत्रीय संपर्क और आर्थिक विकास के हित में किए गए हैं। लेकिन कई विशेषज्ञों का कहना है कि इनमें से कई प्रतिष्ठानों में ‘दोहरे उपयोग’ की क्षमता है जो संकट के दौरान नौसैनिक तैनाती में चीन की मदद कर सकती है।
भारतीय नज़रिया
2018 में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 18वें शांग्री-ला संवाद में भारत के इंडो-पैसिफिक दृष्टिकोण को औपचारिक रूप से प्रस्तुत किया, जिसमें ‘स्वतंत्र, खुले, समावेशी और नियम-आधारित’ हिंद-प्रशांत की बात कही गई थी। भारत ने अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया को शामिल करने वाले चतुर्भुज सुरक्षा संवाद (क्वॉड) की दिशा में जाने का निश्चय किया। अब ऐसा लग रहा है कि क्वॉड को लेकर अमेरिकी नज़रिए में बदलाव आ रहा है।
भारत ने अमेरिका, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, जापान और सिंगापुर जैसे देशों के साथ लॉजिस्टिक्स समझौते किए हैं। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह भी बहुत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि ये दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री यातायात मार्गों में से एक और चीन के ऊर्जा आयात के लिए एक प्रमुख बिंदु, मलक्का जलडमरूमध्य के काफी निकट स्थित हैं। भारत का मॉडल हिंद महासागर के छोटे देशों को किसी एक प्रमुख शक्ति पर बहुत अधिक निर्भरता के बिना दीर्घकालीन साझेदारियों और सहयोग का अवसर देता है। इस इलाके में किसी भी अनहोनी की स्थिति में सबसे पहले पहुँचने वाला देश भारत है।
भारतीय समझ यह है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ने के साथ, बड़ा सवाल यह नहीं है कि किसके पास ज्यादा बंदरगाह हैं, बल्कि यह है कि इलाके में भरोसा किस पर ज्यादा किया जाता है।
चीन से संबंध-सुधार
पिछले दो वर्षों में भारत ने चीन के साथ रिश्तों में भी सुधार किया है, जबकि 2019 में, भारत ने 15 एशियाई-प्रशांत देशों के बीच हुए व्यापार समझौते, आरसीईपी में शामिल न होने का फैसला किया था। उसके कुछ महीनों बाद, अप्रैल 2020 में, भारत सरकार ने प्रेस नोट 3 के माध्यम से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) नीति में संशोधन किया, जिसके तहत भारत के साथ भूमि सीमा साझा करने वाले देशों से निवेश के लिए सरकारी मंजूरी अनिवार्य कर दी गई।
ये दोनों फैसले आंशिक रूप से चीन को लेकर चिंताओं से प्रेरित थे, लेकिन अनिश्चितता के बावजूद, दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध मजबूत हुए हैं। 2025-26 में चीन से आयात 131 अरब डॉलर तक पहुँच गया है।
चीनी पूँजी-निवेश
भारत ने अब एफडीआई नियमों में ढील देकर चीनी पूँजी के लिए अपने द्वार सावधानीपूर्वक खोले हैं। इसके तहत भारतीय कंपनियों में 10 प्रतिशत तक की गैर-नियंत्रण हिस्सेदारी के लिए सरकार की पूर्व अनुमति आवश्यक नहीं है। हालांकि, चीन से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नगण्य रहा है, पर हाल में डिक्सन टेक्नोलॉजीज और वीवो मोबाइल के बीच इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और स्मार्टफोन के निर्माण के लिए एक संयुक्त उद्यम को मंजूरी दी है, जो बदली परिस्थितियों का संकेत कर रहा है।
आर्थिक सर्वेक्षण 2023-24 ने चीन से व्यापार में हो रहे बदलाव से लाभ उठाने के लिए दो विकल्प प्रस्तुत किए थे: या तो चीन की आपूर्ति श्रृंखलाओं के साथ अधिक गहराई से जुड़ें या प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) को प्रोत्साहित करें। इसी सोच के अनुरूप, इस वर्ष मार्च में, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भारत के साथ भूमि सीमा साझा करने वाले देशों से निवेश के लिए एफडीआई नीति में बदलाव को मंजूरी दी, ताकि अधिक निवेश को सुगम बनाया जा सके।
डिक्सन टेक्नोलॉजीज और वीवो मोबाइल के संयुक्त उद्यम को मंजूरी और बैटरी, डिस्प्ले असेंबली और अन्य निर्माण में उपयोग होने वाली 85 वस्तुओं पर सीमा शुल्क में छूट, चार चीनी बिजली उपकरण निर्माण कंपनियों को महत्वपूर्ण बिजली परियोजनाओं के लिए सरकारी निविदाओं में भाग लेने की अनुमति दिए जाने के कुछ ही दिनों बाद हुई है।

